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कविता - " क्यूँ किया तूने "

आशिक़ तू आशिक़ी से पहले, करना ज़रूर गौर,
इश्क़ की राह मे आया है नया दौर,
हाथो मे हाथ लिए निकले तो थे,
हमराह बनकर भी तू, चला गया कहीं और.
क्यूँ किया तूने, ये तू क्या कर गई,
बिना कुछ किए ही मेरी जान ले गई....

लफ़्ज़ों की एहमियत को, तू ना समझ पाया,
जाने के बाद मेरे, मैं तुझे याद आया,
की थी क्या ख़ाता मैने, जो तूने था मुंह मोड़ा,
काँच से भी बदतर, तूने दिल मेरा है तोड़ा.
क्यूँ किया तूने, ये तू क्या कर गई,
बिना कुछ किए ही मेरी जान ले गई....

कब से था बैठा, आँखें बिछाए,
की आएगी तू छिपते – छिपाए,
ना तू आई, ना आहट तेरी,
बिना रोए ही आँसू निकल आए.
क्यूँ किया तूने, ये तू क्या कर गई,
बिना कुछ किए ही मेरी जान ले गई....

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by M Vijish kumar on March 9, 2017 at 5:55pm

आदरणीय आरिफ़ जी , आपका हृदय से धन्यवाद . आपकी बातों का ज़रूर ध्यान रखूँगा 

Comment by Mohammed Arif on March 9, 2017 at 11:29am
आदरणीय विजिश कुमार जी आदाब,प्यार के ख़ूबसूरत अहसासों की सुंदर बगिया खिलाती इस रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई देता हूँ स्वीकार करें । स्त्रीलिंग-पुल्लिंग का ध्यान रखें ।

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