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चुगलियाँ कर बैठी आँखें और हैरानी मेरी (ग़ज़ल 'राज'

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

कितने रिश्ते तोड़ आई तल्ख़ मनमानी मेरी

क्यूँ गवारा हो किसी को अब परेशानी मेरी

 

शमअ के पहलू में रख कर जान  परवाना  कहे

इक कहानी खुद लिखेगी अब ये कुर्बानी मेरी

 

रूबरू आये तो धोका दे गया मेरा नकाब

चुगलियाँ कर बैठी आँखें और हैरानी मेरी  

 

टांक दो दिलकश सितारे कहकशाँ से तोड़कर

बोलती है अब्र से देखो चुनर धानी मेरी

 

शह्र भर में कू ब कू तक हो गई रुस्वाइयाँ

कर गई बर्बाद मुझको हाय नादानी मेरी

 

पीले पत्तों को डराती ख़्वाब में आकर ख़िज़ाँ

मिलना  तुम तैयार दर पे चाल तूफानी मेरी

 

ढूँढती इक दिन ख़ुशी वो आएगी सोचूँ मगर  

कैसे पहचानेगी मुझको शक्ल अनजानी मेरी

.

-----मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by rajesh kumari on March 1, 2017 at 6:39pm

आद० सुशील सरना जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका तहे दिल से शुक्रिया .

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 1, 2017 at 3:28pm
आदरणीया राजेश जी इस शानदार ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 1, 2017 at 2:51pm
दी शमअ के माने ?
Comment by Sushil Sarna on March 1, 2017 at 1:19pm

कितने रिश्ते तोड़ आई तल्ख़ मनमानी मेरी
क्यूँ गवारा हो किसी को अब परेशानी मेरी

वाह आदरणीया राजेशकुमारी जी वाह इस खूबसूरत अहसासों की ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

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