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गजल( आज तुम यह क्या किये बैठे हुए हो)

 2122  2122  2122 

आज तुम यह क्या किये बैठे हुए हो
बेवजह का गम लिये बैठे हुए हो।1

कौन सुनता है यहाँ कुछ बात ढब की
दिल नसीहत को दिये बैठे हुए हो।2

और होता मौन का मतलब यहाँ पर
क्या पता क्यूँ मुँह सिये बैठे हुए हो।3

बदगुमानों की यहाँ बल्ले हुई बस
आशिकी का भ्रम जिये बैठे हुए हो।4

एक से बढ़ एक नगमे बुन रहे सब
तुम  पुरानी धुन लिये बैठे हुए हो।5

काफिले बढ़ते गये सब साथियों के
तुम यहाँ किसके लिये बैठे हुए हो।6

माँगना पड़ता यहाँ कुछ बोलकर
क्यूँ 'मनन' सब तोलकर बैठे हुए हो।7
मौलिक व अप्रकाशित @मनन


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Comment by Samar kabeer on January 30, 2017 at 3:33pm
एक मिसरा देखिये :-
"सब अँधेरों से कोई वादा किये बैठे हैं"
अब इस मिसरे को यूँ कहें तो:-
सब अँधेरों से कोई वादा किये हुए बैठे हैं",तो इसमें 'हुए' शब्द भर्ती का हुआ न, बस मैं इतना ही निवेदन करना चाहता हूँ ।
Comment by Manan Kumar singh on January 29, 2017 at 9:03pm

आदरणीय समर जी नमस्ते। आपका कहना वाजिब है। पढ़ा और पढ़ा हुआ/ हुए प्रयोग में तो पाये ही जाते हैं न। जैसे कि पढ़ा पाठ या पढ़ा हुआ पाठ। पढे लोग या पढ़े हुए लोग। वैसे आपकी इस्लाह काबिले गौर होती है और हमलोग बहुत कुछ सीखते हैं,सादर। 

Comment by Samar kabeer on January 29, 2017 at 7:07pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है बधाई आपको ।
रदीफ़ में 'हुए'शब्द की क्या ज़रूरत जबकि 'बैठे हो'में ही बात पूरी हो जाती है ?
Comment by Manan Kumar singh on January 29, 2017 at 5:22pm

आदरणीय कालीपद जी, शेर की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ, सादर। 

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 29, 2017 at 3:53pm

आ मनन कुमार जी ,आपका मतला बहुत सुन्दर  लगा मुझे हार्दिक बधाई | 

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 29, 2017 at 3:53pm

आ मनन कुमार जी ,आपका मतला बहुत सुन्दर  लगा मुझे हार्दिक बधाई | 

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