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अधूरी प्रीत से ....

अधूरी प्रीत से ....

लब
खामोश थे
पलकें भी
बन्द थीं
कहा
मैंने भी
कुछ न था
कहा
तुमने भी
कुछ न था
फिर भी
इक
अनकहा
नन्हा सा लम्हा
आँखों की हदें तोड़
देर तक
मेरी हथेली पे बैठा
मुझे
मिलाता रहा
मेरे अतीत से
अधूरी तृषा में लिपटी
अधूरी प्रीत से

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 11, 2017 at 1:42pm

आदरणीय समर कबीर साहिब सृजन आपके शीरीं अल्फ़ाज़ का तहे दिल से शुक्रिया करता है। 

Comment by Samar kabeer on January 10, 2017 at 9:00pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,भाई मज़ा आ गया इस कविता से,आज का दिन शाइरी के हिसाब से मेरा अच्छा दिन था कि इसमें आपकी इस बहतरीन कविता पढ़ने को मिली,भरपूर शाइरी,कहन में जो रवानी है वो पाठक को अपनी ओर खींचने में। सफ़ल है, इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on January 10, 2017 at 5:20pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी प्रस्तुति आपकी आत्मीय सराहना से उपकृत हुई। आपका हार्दिक आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 10, 2017 at 4:58pm

आदरणीय सुशील सरना सर, इस भावाभिव्यक्ति हेतु हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 

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