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गजल(काफियों की...)

2122 2122 2122 2
काफियों का बढ़ गया बाजार देखा है
इश्क को होते हुए लाचार देखा है।1

डूबती कश्ती नहीं मँझधार है तो क्या?
हर बखत सहमी नजर में प्यार देखा है।2

लड़ रहा कोई धनुर्धर रोशनी खातिर
व्यूह का निर्माण तो बेकार देखा है।3

सच पराजित हो रहा हर मोड़ पर दिखता
झूठ की गर्दन सजाया हार देखा है।4

माँगते दाता यहाँ पर भीख में हक भी
रहजनों को तो बने सरकार देखा है।5

दे सकेंगे क्या फ़रिश्ते देश को कुछ भी
लूट का हर शख्स है फनकार, देखा है।6

छँट रहा लगता अँधेरा मंद सब तारे
रोशनी का बस जरा आसार देखा है।7
मौलिक व अप्रकाशित @मनन

Views: 607

Comment

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Comment by Manan Kumar singh on December 25, 2016 at 7:39pm
आदरणीय गोपाल नारायण जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका;परिमार्जन कर पेश किया है।
Comment by Manan Kumar singh on December 25, 2016 at 7:08pm
आदरणीय देखता हूँ,सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2016 at 6:30pm

आ० मनन जी , आपने बह्र का खुलासा नहीं किया इसलिए इसके प्रवाह की परख नहीं हो सकी . सापके मतले के उला और सानी में मुझे रब्त की कमी दिखती है . सादर .

Comment by Manan Kumar singh on December 24, 2016 at 9:04am
चौहान जी
Comment by Manan Kumar singh on December 24, 2016 at 9:03am
जरूर आदरणीय मिथिलेश जी।
Comment by Manan Kumar singh on December 24, 2016 at 9:03am
आभार चौहान नई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2016 at 1:35am

कृपया ग़ज़ल की बह्र / वज्न लिख दीजिये आदरणीय 

Comment by narendrasinh chauhan on December 23, 2016 at 5:46pm

लाजवाब रचना

Comment by Manan Kumar singh on December 23, 2016 at 7:44am
बहुत बहुत आभार
Comment by आशीष यादव on December 23, 2016 at 1:41am
Behatarin ghazal. Shandar prastuti. Aisa hi ho gya h jmana.
Sundar rachna pr badhai.

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