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इंसानी फितरत के जलवे दिन ये कैसे आये हैं

सन्नाटा गलियों में छाया संगीनों के साये हैं

 

चप्पे-चप्पे पर दिखता है आतुर सैनिक का पहरा

धरती की रक्षा करने की शत-शत कसमे खाये हैं

 

कुछ तो अजगुत कहता है यह सघन सुरक्षा का घेरा

क्या फिर से तारामंडल में घन संकट के छाये हैं

 

पोथी लेकर भोली बाला घूम रही वीराने में

अक्षर ने शब्दों से मिल कर गीत सुहाने गाये हैं  

 

खौल रहा है खून वतन का मौसम में खामोशी है

कहर न जाने  कितने कितने संबंधों ने ढाये हैं  

 

 (मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 23, 2016 at 12:09am

आदरणीय गोपाल सर, बहुत शानदार ग़ज़ल कही है आपने. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 22, 2016 at 11:20am

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , बहरे मीर पर बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आपने , दिल से बधाइयाँ स्वीकार कीजिये ।

Comment by नाथ सोनांचली on November 21, 2016 at 6:02am
मोहतरम डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी , उम्दा गजल के लिए बधाई निवेदित हैं।
Comment by Samar kabeer on November 20, 2016 at 4:58pm
जनाब डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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