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माँ ...

दर्द का
मंथन हुआ तो
एक सागर
बूँद बन
लहद पर
ऐसा गिरा
कि
गर्म लावे से पिघल

माँ
लहद से बाहर
आ गयी
ले के दर्द बेटे का
फिर
लहद में
समा गयी

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 22, 2016 at 7:06pm

आदरणीय समर कबीर साहिब दिल को तस्सली देने के लिए हार्दिक आभार। कृपया अपना स्नेह बनाये रखें। 

Comment by Samar kabeer on October 21, 2016 at 2:54pm
आप अपने लेखन कस सफ़र जारी रखिये,इस बारे में पहले भी अर्ज़ कर चुका हूँ कि ओबीओ के अध्कितर सदस्य फेसबुक पर बराबर सक्रिय दिखाई देते हैं,और वहां जो झूटी वाह वाही मिलती है,उससे बहुत ख़ुश होते हैं,मेरे लिये पहले ओबीओ है बाक़ी उसके बाद,निराश होने की कोई ज़रूरत नहीं,मेरी तबियत ठीक नहीं होती उसी हालत में मंच पर हाज़िरी नहीं होती,वरना पहली फ़ुर्सत में मंच पर आता हूँ ।
आपकी कविताएं मुझे बहुत प्रभावित करती हैं ।
Comment by Sushil Sarna on October 21, 2016 at 1:52pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति के भावों की गहनता को आपकी स्वीकृति देती प्रशंसा ने सृजन को जो मान दिया है उसके लिए बन्दा आपका शुक्रगुजार है। आप की स्नेही थपकियों से मैं थोड़ा संभल जाता हूँ वरना लगता है शायद मेरा सृजन इस मंच के काबिल नहीं है। दो दिन तक एक भी पाठक अगर सृजन तक न आये तो दिल आहत होता है। नए सृजन को दिल नहीं करता।  आप आते हैं तो लगता है की सृजन कोई तो रखवाला है जो सृजन के दर्द को जानता है।  बहरहाल आपकी इस ख़ासियत का मैं दीवाना हूँ।  आपका तहे दिल से शुक्रिया सर। 

Comment by Samar kabeer on October 20, 2016 at 9:53pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब, चन्द पंक्तियों में बहुत गहरे भाव समेट दिए आपने,इस बहतरीन प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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