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आज अपनों से हुआ अब सामना है (एक प्रयास ) /अलका चंगा

2122 2122 2122


जो हुई पाहुन कभी अपने हि घर में
आज अपनों से हुआ अब सामना है

हर जनम का साथ चाहा है दिलों ने
तीन लफ़्ज़ों को नहीं अब थामना है

हाथ जो भरते है उसकी मांग सूनी
उम्र भर का साथ ही अब कामना है

डोलियां उठती है जो शहनाइयों में
अर्थियां उनकी सजाना हाँ... मना है

चाहतें अपनी तभी तक हैं अधूरी
इश्क में अश्कों भरा दिल गर सना है

 "मौलिक व अप्रकाशित" 

"पाहुन" मराठी में इसका अर्थ है अस्थाई
सना-- चमक

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Comment

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 18, 2016 at 11:08am

आदरणीय गुणीजन,सादर नमस्कार , कल से ही ओबीओ नहीं खुल पा रहा ,कृपया मार्गदर्शन करें "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 65" ....के संशोधन कहाँ और कैसे पोस्ट करने है ,धन्यवाद।

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