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२२१ २१२१ १२२१ २१२


पगडंडियों के भाग्य में कोई नगर कहाँ ?
मैदान गाँव खेत सफ़र किन्तु घर कहाँ ? 
 
होठों पे राह और सदा मंज़िलों की बात
पर इन लरजते पाँव से होगा सफ़र कहाँ ? 
 
हम रोज़ मर रहे हैं यहाँ, आ कभी तो देख..
किस कोठरी में दफ़्न हैं शम्सो-क़मर कहाँ ? 
 
सबके लिए दरख़्त ये साया लिये खड़ा
कब सोचता है धूप से मुहलत मगर कहाँ !
 
जो कृष्ण अब नही तो कहाँ द्रौपदी कहीं ?
सो, मित्रता की ताब में कोई असर कहाँ ? 
 
क़ातिल तरेर आँख.. जताता है दोस्ती..
ऐसे में कौन कण्ठ ही होगा मुखर कहाँ ? 
 
अहसास ही सवाल थे अहसास ही ज़वाब
’रक्खी है आज लज्जत-ए-दर्द-ए-जिगर कहाँ !’
********
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by vandana on August 19, 2016 at 7:25pm

होठों पे राह और सदा मंज़िलों की बात 
पर इन लरजते पाँव से होगा सफ़र कहाँ ? 
 
सबके लिए दरख़्त ये साया लिये खड़ा 
कब सोचता है धूप से मुहलत मगर कहाँ !

 

जो कृष्ण अब नही तो कहाँ द्रौपदी कहीं ?

सो, मित्रता की ताब में कोई असर कहाँ ? 

वाह बहुत खूब बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय 

Comment by Manoj kumar Ahsaas on August 19, 2016 at 2:58pm
नमन करता हूँ आदरणीय
आपकी किसी रचना के आने से कई फायदे हो जाते हैं
सटीक जानकारी
अच्छी रचना का स्वाद
और भी बहुत कुछ एक जानकारी हमे भी दे दीजिये

इन लरजते पाँव लिखा गया है
बहुवचन में भी पाँव ही लिखते हैं क्या पाँवो नहीं
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 19, 2016 at 8:31am

आदरणीय सौरभ भाई , बेहतरीन मतला से शुरु हुआ सफर बेहतरीन गिरह पर खत्म हुआ है , क्या बात है । दिल से मुबारक बाद स्वीकार करें इस ग़ज़ल के लिये ।

बाक़ी प्रतिक्रियाओं के पढने के बाद मै तो यही कहूँगा कि मुझे इंगित शेर मे कहीं कोई कमी नही दिखी । बहर , अरूज , व्याकरण , भाषा और  कहन सही होने के बाद  शेर पर कहने के लिये कुछ बचता कहाँ है ?   जहाँ तक  कहन की बात है, तो कहन में सम्भावनायें तो हमेशा बनी ही रहतीं हैं , हर पाठक अपनी अपनी सोच से संभावानायें व्यक्त भी कर सकता है ।

किस कोठरी और इस कोठरी - पर भी मै आपसे सहमत हूँ ,  किस कोठरी कहने में विस्तार पा रही है कहन ।

और राबता समझ न आना कहन की जगह पाठक की समझ की कमी भी हो सकती है , शायद  शम्सो-क़मर  को सीधे अर्थों मे ले रहे हों ?

पूरी ग़ज़ल के लिये आपको पुनः बधाइयाँ ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2016 at 11:43pm

आदरणीय तस्दीक अहमद साहब, आप ग़ज़ल पर आये इसकी प्रसन्नता हमें भी है. हार्दिक धन्यवाद. आपके प्रश्न या आपकी शंका के बरअक्स फिर से सोचूँगा.

शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2016 at 11:41pm

प्रोत्साहन हेतु हार्दिक धन्यवाद, आदरणीया राजेश कुमारी जी.. 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 18, 2016 at 8:30pm

मोहतरम जनाब सौरभ  साहिब,  बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है  शेर दर शेर  मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ---शेर नंबर 3 के ऊला और सानी मिसरे में तालमेल की कुछ कमी लग रही है   देख लीजियेगा -----


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 18, 2016 at 6:36pm

जो कृष्ण अब नही तो कहाँ द्रौपदी कहीं ?
सो, मित्रता की ताब में कोई असर कहाँ ? 
 
क़ातिल तरेर आँख.. जताता है दोस्ती.. 
ऐसे में कौन कण्ठ ही होगा मुखर कहाँ ? 
बहुत सुन्दर अशआर हुए आदरणीय सौरभ जी अच्छी ग़ज़ल के लिए दाद कुबूलें 

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 18, 2016 at 6:13pm
शुभ शुभ आदरणीय

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2016 at 3:42pm

आप ही को क्यों आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी, अबतक इसे पढ़ चुके हर एक पाठक को यह प्रस्तुति अच्छी ही लगी है. ओबीओ का यह पटल पर किसी रचना केलिए ’अच्छा से बहुत अच्छा’ करने के लिए उचित और सार्थक माहौल प्रदान करने का काम करता है. यह अवश्य है कि कई बार इस माहौल के कारण ही हम कुछ ऐसी बातें भी कहते-करते रहते हैं जो उक्त रचना के लिए तो नहीं होती, बल्कि उसके अलावा हुआ करती हैं. और, दूसरे पाठकों के लिए मार्गदर्शक की तरह होती हैं. 

शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2016 at 3:38pm

आदरणीय विजय शंकर जी, सादर आभार.. 

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