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२२१२ २२१२ २२

 

हमने यहीं पर ये चलन देखा

हर गैर में इक अपनापन देखा

 

देखी नुमाइश जिस्म की फिरभी

जूतों से नर का आकलन देखा

 

हर फूल ने खुश्बू गजब पायी

महका हुआ सारा  चमन देखा

 

लिक्खा मनाही था मगर हमने

हर फूल छूकर आदतन देखा

 

उस दम ठगे से रह गए हम यूँ  

फूलों को भँवरों में मगन देखा

 

होती है रुपियों से खनक कैसे

हमने भी रुक-रुक के वो फन देखा

 

रोशन चिरागों के तले देखे  

गलता हुआ बेबस बदन देखा

 

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on July 3, 2016 at 3:00pm

 प्रस्तुत गजल को सराहने के लिए बहुत-बहुत आभार आदरणीया कान्ता रॉय जी सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 3, 2016 at 6:18am
वाह आ. अशोक रक्ताले सर ख़ूबसूरत मतले से शुरुआत हुई है आखिर तक ग़ज़ल के साथ बहता चला गया, वाहह। खास तौर से रुपियों वाला शे'र तो कमाल है
Comment by Mahendra Kumar on July 2, 2016 at 11:15pm
आपका पहला शेर ओबीओ के लिये एकदम सटीक है। आपकी ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद आयी। सभी शेर अच्छे हैं। हार्दिक बधाई, सादर!
Comment by kanta roy on July 2, 2016 at 11:14pm

 

हमने यहीं पर ये चलन देखा

हर गैर में इक अपनापन देखा...वाह ! 

बेहतरीन  ग़ज़ल  कही  है  आपने  आदरणीय अशोक  जी ,बधाई  प्रेषित  है .

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