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“अम्मा हो सकता है कि पुलिस आपसे भी पूछताछ करे I आपको बस इतना कहना है कि मै तो हफ्ते भर पहले ही आई हूँ यहाँ , कुछ ज्यादा नहीं जानती और .."  बेटा बोले जा रहा था पर सुमित्रा जी का दिमाग़ सुन्न था I

बेटे के यहाँ काम करने वाली बाई सीता ने कल रात पति से झगडे के बाद फाँसी लगा ली थीI

सुमित्रा जी दस दिन पहले ही बेटे के पास मुंबई आई थीं I  बेटे बहू के काम पर जाने के बाद सीता के साथ सुख दुःख की बातें चलती रहती थीं उनकीI परसों  बहू ने समझाया कि बाई से काम के अलावा ज्यादा बात चीत नहीं किया करें I बड़े शहर में ये सब नहीं चलता I

“क्या हुआ अम्मा ?आपको समझ आया जो इन्होने समझाया ?” बहू  ने कंधे झंक्झोरे उनके I

“हाँ ..हाँ वो .वो सीता दो दिन से परेशान लग रही थी “  सुमित्रा जी अपने में  बुद्बुदानें  लगीं:

“अगर मै पूछ लेती कि क्या हुआ .तो..तो शायद ..”I

मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment by pratibha pande on July 1, 2016 at 7:20pm

हार्दिक आभार आदरणीय मुनीश तनहा जी 

Comment by pratibha pande on July 1, 2016 at 7:19pm

 हार्दिक आभार आदरणीया नीता जी 

Comment by pratibha pande on July 1, 2016 at 7:18pm

सही कह रहे हैं आप  ,आत्महत्या करने के पहले इंसान  परोक्ष अपरोक्ष रूप में मदद की गुहार अवश्य करता है और वो गुहार सुनने पर कुछ जानें बच भी सकती हैं   हार्दिक आभार आपका ,रचना पर आकर उत्साहवर्धन करने के लिए  आदरणीय उस्मानी जी 

Comment by pratibha pande on July 1, 2016 at 7:14pm

स्नेहिल हौसला अफजाई के लिए हार्दिक आभार आदरणीय सुशील सरना जी 

Comment by pratibha pande on July 1, 2016 at 7:13pm

हार्दिक आभार आदरणीय हर्ष महाजन जी 

Comment by pratibha pande on July 1, 2016 at 7:12pm

हार्दिक आभार प्रिय राहिला जी रचना पर आकर उत्साहवर्धन करने के लिए 

Comment by pratibha pande on July 1, 2016 at 7:11pm

आपको रचना पसंद आई ,मेरा लिखना सार्थक हुआ आपके स्नेहिल अनुमोदन के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी 

Comment by pratibha pande on July 1, 2016 at 7:07pm

  रचना के अनुमोदन व् उत्साहवर्धन  के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी 

Comment by munish tanha on June 30, 2016 at 8:45am

बहुत अच्छी सटीकशब्दों का प्रयोग इसे प्रभावशाली बनाता है बधाई स्वीकार करें 

Comment by Nita Kasar on June 28, 2016 at 12:44pm
वे भी इंसान है जो हमारी सहायता करते है फिर दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों ?काश अम्माँ जी पूछ लेती तो वह इरादा बदल सकती थी ।संवेदनशील कथा के लिये बधाई आद० प्रतिभा पांडे जी ।

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