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चूम आये हम गुलाब-ग़ज़ल

2122 2122 2122 212(1)
2122 2122 2122 212

ज़िद थी उनको चूमने की, चूम आये हम गुलाब।
पाक वो भी रह गये, औ हो न पाये हम ख़राब।।

थी ये ख़्वाहिश रात भर आगोश में उनके रहें।
चाँदनी बिखरी रही, शब भर रहा छत पर शबाब।।

कौन कहता जिस्म का मिलना ही पाना है मियाँ।
कौन मीरा का किशन था, पा गया मैं भी जवाब।।

धड़कनों में उसकी सरगम, और ख़्शबू साँस में।
देखिये चेहरे पे मेरे कैसा उसका है रुआब।।

प्यास थी इक जो महल में ख़त्म होती थी नहीं।
घूमने निकले जो बाहर तो मिटी जाकर जनाब।।

मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 2, 2016 at 5:03pm
आदरणीय सौरभ सर सादर प्रणाम, इस प्रगति में आपका पूर्ण सहयोग है और ओबीओ तो मेरी पाठशाला ही है।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2016 at 4:23am

वाह वाह ! आपकी ग़ज़ल भली लही भाई पंकज जी. मात्रिक बहर के अलावा भी आप मिसरे साध रहे हैं, यह प्रसन्नता की बात है.  

शुभेच्छाएँ

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 27, 2016 at 9:06pm
आदरणीय गिरिराज सर सादर प्रणाम और आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 27, 2016 at 9:06pm
आदरणीय श्याम नारायण वर्मा सर सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 27, 2016 at 9:04pm
आदरणीय धर्मेन्द्र जी बहुत बहुत आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 27, 2016 at 2:42pm

आदरनीय पंकज भाई , बहुत बढ़िया गज़ल हुई है , दिले से बधाइयाँ आपको । आ. अशोक भाई  की सलाह उचित है !

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 27, 2016 at 2:17pm
आदरणीय महेंद्र जी सादर आभार।
Comment by Shyam Narain Verma on June 27, 2016 at 11:01am
बहुत खूब ॥ आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥
Comment by Mahendra Kumar on June 27, 2016 at 9:05am
उम्दा ग़ज़ल आदरणीय पंकज जी! हार्दिक बधाई!!
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 27, 2016 at 9:02am
आदरणीय हर्ष महाजन जी सादर आभार और समुचित अभिवादन

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