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ग़ज़ल ( आँखों से निकलते हैं )

ग़ज़ल ( आँखों से निकलते हैं )  

   १२२२ -१२२२ -१२२२ -१२२२

तड़प कर जो गमे जाने जहाँ दिल में पिघलते हैं ।

वही तो अश्क बन कर मेरी आँखों से निकलते हैं ।

क़यादत पर मेरी यह सोच के उंगली उठाना तुम

मेरे पीछे ही अपनों की तरह अग्यार चलते हैं ।

अगर देना नहीं था साथ तो पहले बता देते

अचानक कबले मंज़िल किस लिए रस्ता बदलते हैं ।

मुहब्बत करने वालों को है कब परवाह दुनिया की

जहाँ भी शमआ  जलती है वहां परवाने जलते हैं ।

जो खारों की हिमायत करने को  आये हैं गुलशन में

सुना है अपने पैरों से वो फूलों को मसलते हैं ।

 

ज़माना जानता है यह मुहम जारी है  मुद्दत से                                    

लगायी जाती है ठोकर हमें जब भी संभलते हैं ।

 

गुमा होता है वह तस्दीक बदजन हो गए मुझ से

न यूँ ही बज़्म में अरबाब खुश हो कर उछलते हैं ।

(मौलिक व अप्रकाशित )                                                

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 5, 2016 at 2:19pm

 मोहतरमा राहिला  साहिबा  , हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से  बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 5, 2016 at 2:18pm

 जनाब पवन कुमार  साहिब , हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से  बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 5, 2016 at 2:17pm

मोहतरम जनाब सुशील सरना साहिब , हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Rahila on June 4, 2016 at 11:09pm
अगर देना नहीं था साथ तो पहले बता देते
अचानक कबले मंज़िल किस लिए रस्ता बदलते..बहुत खूब लिखा है आदरणीय सर जी! खूब बधाई । सादर
Comment by Pawan Kumar on June 4, 2016 at 3:35pm

ज़माना जानता है यह मुहम जारी है  मुद्दत से                                    

लगायी जाती है ठोकर हमें जब भी संभलते हैं ।

बहुत खुब, एक एक पंक्ति लाजवाब है!
हार्दिक बधाई

Comment by Sushil Sarna on June 4, 2016 at 1:18pm

मुहब्बत करने वालों को है कब परवाह दुनिया की
जहाँ भी शमआ जलती है वहां परवाने जलते हैं ।

वाह बहुत खूब आदरणीय तस्दीक साहिब ... बड़े ही दिलकश अशआर लिखे हैं आपने। इस मनमोहक ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

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