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तलाशी ले रहा है आइना, पर मैं लजाता हूँ- ग़ज़ल(इस्लाह के लिए)---संशोधित

1222 1222 1222 1222
तलाशी ले रहा है आईना, पर मैं लजाता हूँ।
लगे हैं दाग जो अंदर, मेरे उनको छिपाता हूँ।।

चढ़ा कर रंग रोगन का, कवर मैं खुद के चेहरे पर।
हूँ मैं भी खूबरू बस, ऐसा दुनिया को दिखाता हूँ।।

मग़र मालूम है मुझको, हक़ीक़त क्या है अन्तस की।
महज़ मैं मोह औ मद के लिए, महफ़िल सजाता हूँ
।।

यही सच है छिपाना व्यर्थ है सब जानता है "मन"
की मैं दौलत की ख़ातिर ही, तो बस जीवन गँवाता हूँ।।

इसे सुंदर बनाने को, हाँ अंदर घर सजाने को।
रुको, पंकज मैं चल के दाँव कुछ बाजी लगाता हूँ।।

मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by मिथिलेश वामनकर on May 11, 2016 at 2:26pm

आदरणीय पंकज जी, ग़ज़ल कहने का बढ़िया प्रयास हुआ है. आदरणीय निलेश जी की इस्लाह अनुसार संशोधन निवेदित है. सादर 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 11, 2016 at 1:46pm

तलाशी ले रहा है आईना, पर मैं लजाता हूँ।
लगे हैं दाग जो अंदर, उनको मैं छिपाता हूँ।।

बहुत सुन्दर  , भाव और गजल ....

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2016 at 10:40pm
आदरणीय नीलेश सर, मत्ले में "हाँ"शब्द छूट गया है। इसे यूँ होना था-

तलाशी ले रहा है आईना, पर मैं लजाता हूँ।
लगे हैं दाग जो अंदर, हाँ उनको मैं छिपाता हूँ।।

उपयोगी इस्लाह के लिए, सादर आभार
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 10, 2016 at 10:25pm

१२२२//     १२२२.....
लगे हैं दा// ग जो अंदर//, आगे  बेबहर उनको मैं छिपाता हूँ।।
.
अगर ऐसा नहीं है तो, बताओ किसलिए आख़िर।
मैं दौलत के लिए ही क्यूँ, भला जीवन गँवाता हूँ।।...यहाँ  ऐसा  यानी  कैसा ..ये स्पष्ट नहीं है ..
चलो पंकज चलो कुछ, दाँव कुछ बाजी लगाता हूँ।।..यहाँ चलो के साथ हूँ शतुर्गुर्बा दोष  है ...हूँ के पहले चल आना चाहिए ..
शानदार प्रयास के लिए बधाई ...

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