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(१)

 

जिनमें प्रेम करने की क्षमता नहीं होती

वो नफ़रत करते हैं

बेइंतेहाँ नफ़रत

 

जिनमें प्रेम करने की बेइंतेहाँ क्षमता होती है

उनके पास नफ़रत करने का समय नहीं होता

 

जिनमें प्रेम करने की क्षमता नहीं होती

वो अपने पूर्वजों के आखिरी वंशज होते हैं

 

(२)

 

तुम्हारी आँखों के कब्जों ने

मेरे मन के दरवाजे को

तुम्हारे प्यार की चौखट से जोड़ दिया है

 

इस तरह हमने जाति और धर्म की दीवार के

आर पार जाने का रास्ता बना लिया है

 

हमारे जिस्म इस दरवाजे के दो ताले हैं

हम दोनों के होंठ इन तालों की दो जोड़ी चाबियाँ

इस तरह दोनों तालों की एक एक चाबी हम दोनों के पास है

 

जब जब दरवाजा खुलता है

दीवाल घड़ी बन्द पड़ जाती है

 

(३)

 

मैं तुम्हारी आँख से निकला हुआ आँसू हूँ

मुझे गिरने मत देना

अपनी उँगली की कोर पर लेकर

अपने होंठों से लगा लेना

 

मैं तुम्हारे जीवन में नमक की कमी नहीं होने दूँगा

 

(४)

मैं तुम्हारी आँख में ठहरा हुआ आँसू हूँ

मुझे बाहर मत निकलने देना

मैं तुम्हारे दिल को सूखने नहीं दूँगा

 

प्रेम की फ़सल खारे पानी में ही उगती है

 

(५)

हँसते समय तुम्हारे गालों में बनने वाला गड्ढा

बिन पानी का समंदर है

जो न तो मुझे डूबोता है

न तैरकर बाहर निकलने देता है

-----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 5, 2016 at 6:34pm

बहुत बहुत  शुक्रिया आदरणीय  नरेन्द्र जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 5, 2016 at 6:34pm

बहुत  बहुत शुक्रिया आदरणीया राहिला जी

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 5, 2016 at 6:13pm

प्रेम  भाव पर अलग  ही अंदाज  में  सुंदर रचनाएं | वाह  ! बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 5, 2016 at 10:48am

वाह वाह ये रूमानी अंदाज भी है आपकी लेखनी का ..सभी कवितायेँ पसंद आई एक से बढ़कर एक बहुत बहुत बधाई आ० धर्मेन्द्र जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 5, 2016 at 10:19am

आ० धर्मेन्द्र जी ---------- बहुत ही खूबसूरत  कवितायेँ हैं . आपकी कल्पना शक्ति विलक्षण है 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 4, 2016 at 6:43pm
Sunder rachnaauein hardic badhayee sweekar karein ssfsr९
Comment by narendrasinh chauhan on April 4, 2016 at 1:43pm

खूब सुन्दर रचनाए

Comment by Rahila on April 3, 2016 at 6:49pm
वाह्ह. .मंत्र मुग्ध सा कर दिया नन्ही कविताओं ने, मैं इस विधा की पारखी नहीं हूं लेकिन जब कविताओं को पढ़ा तो दोबारा फिर पढ़ने की इच्छा हुई । बहुत खूब आद. !बहुत बधाई । सादर

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