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आहत करने से पहले कितना आहत होना पड़ता है

एक आस थी बावरी
बहुत दिन धकिया गयी 
उदास होने ही नहीं दिया  मन
आखिर आज
जब पहुंच ही गए हो
ले के अपने तंज ,दंश
तो आस का क्या
मन का तो बिलकुल ही क्या
मजाल कि बिन झुलसे रह जाए
कोई चूं भी कर जाए
आप तो  बस आप हैं 
सब आप की सौगात है
बहुत बधाई हो
लो हार ही गए हम
तीर निशाना नहीं चूका
लो उदास हो गए हम
अपने लिए नहीं
बिलकुल भी नहीं
मालूम है कि
इतनी बेरूखी पर उतर आना
इतना आसान नहीं होता
मालूम है कितना दिल जलाना पड़ता है
कटु शब्दों को ढूंढ के लाना पड़ता है
अब यह मत पूछना
की हमें कैसे पता
कि आहत करने से पहले कितना आहत होना पड़ता है स्वंय
.
"मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by amita tiwari on March 4, 2016 at 9:05pm

तहे दिल से बहुत शुक्रिया…"

Comment by Samar kabeer on March 1, 2016 at 2:40pm
मोहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब,इस सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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