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ग़ज़ल : हुई जो खबर नाम चलने लगा है

हुई जो ख़बर नाम चलने लगा है ।

ये सारा जहां  हमसे जलने लगा है ।।

 

यहां झूठ से सबको नफरत है फिर भी ।

है किसकी ये शह जो मचलने लगा है ।।

न तुम आग उगलो न मै ज़ह्र घोलूं  ।

ये सोचें लहू क्‍यूँ उबलने लगा है ।।

बुरे वक्त में लोग करते है जुर्रत ।

हुई शाम सूरज भी ढलने लगा है ।।

तुम्‍हें देखते ही  हमारी कबा से ।

उदासी का आलम पिघलने लगा है ।।

 

अज़ल से वही है ज़फ़ा का बहाना ।

 कि मौसम के जैसा बदलने लगा है ।।

 

ये सूखे शज़र छांव देने लगे फिर ।

कि घर का भी मंज़र बदलने लगा है ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 944

Comment

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Comment by Ravi Shukla on September 16, 2015 at 2:19pm

आदरणीय शिज्‍जू साहब बहुत बहुत शुक्रिया आपका मेहरबानी शेर पसंद आये ।

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on September 16, 2015 at 12:22pm

waah mitra waah - dheron daad kubool karen

Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 16, 2015 at 10:56am
बेहतरीन सर

सादर बधाई ....
Comment by Madan Mohan saxena on September 16, 2015 at 10:21am

बेहतरीन
न तुम आग उगलो न मै ज़ह्र घोलूं ।
ये सोचें लहू क्‍यूँ उबलने लगा है ।।

Comment by Rahul Dangi Panchal on September 16, 2015 at 9:46am
अच्छी गजल हुई आदरणीय

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 15, 2015 at 7:27pm
बेहतरीन आदरणीय रवि शुक्ला जी मतला, तीसरा और आखिरी शेर तो कमाल है

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