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गुरु गोविन्द (लघुकथा) - शिक्षक दिवस पर विशेष

"देख ली अपने चेले की करतूत?" वयोवृद्ध शायर के सामने एक पत्रिका को लगभग फेंकते हुए एक समकालीन ने कहा। 

"क्या हो गया भाई ? इतना भड़क क्यों रहे हो ?"

"इसमें अपने चेले का आलेख पढ़िए ज़रा।" 

"कैसा आलेख है?"

"आपकी ग़ज़लों में नुक्स निकाले हैं उसने इस पत्रिका में, आपकी ग़ज़लों में। मैं कहता था न कि मत सिखाओ ऐसे कृतघ्न लोगों को?" 

समकालीन बोले जा रहे थे, किन्तु वयोवृद्ध शायर बड़ी तल्लीनता से आलेख पढ़ने में व्यस्त थे। 

"देख लिया न? अब बताइए, क्या मिला आपको ऐसे लोगों पर दिन रात मेहनत करके ?"

"उम्र के आखरी पड़ाव में अपने शिष्य की इतनी प्रगति और ईमानदारी देखकर मुझे बहुत कुछ मिल गया भाई।" पत्रिका एक तरफ रखते हुए उनके चेहरे पर एक अनोखी चमक थी।  

"ऐसा क्या कुबेर का खज़ाना मिल गया आपको?"         

"आज मुझे अपना सच्चा उत्तराधिकारी मिल गया है।"

.

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by kanta roy on March 5, 2016 at 12:08pm

लेखन सन्दर्भ में , जब भी कुछ समझ में नहीं आता है ,आपकी रचनायें  पढ़ने लगती हूँ और बहुत कुछ  सीखते हुए , स्वयं के लिए हमेशा एक पाठ पा जाती हूँ।  वंदन सर जी आपको ।  

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 18, 2015 at 11:38pm

आपकी  इस  लघुकथा ने हृदय को हिला सा दिया आदरणीय सर, एक-एक शब्द जैसे माला के उस रूद्राक्ष जैसा है जो 108 मनकों में से एक मनका है, यदि एक भी कम ज़्यादा हो जाये तो  माला किसी काम की नहीं| नमन सर |

Comment by shashi bansal goyal on September 16, 2015 at 8:30pm
आदरणीय योगराज जी बहुत ही संदेशपरक सारगर्भित रचना हुई है । गुरु ने न केवल ग़ज़ल विधा का ज्ञान दिया बल्कि सच्चाई और स्पष्टतावादी होने का नैतिक गुण भी सिखाया । साथ ही गुरु ने भी उसकी प्रशंसा कर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सन्देश दिया कि उसे चापलूसों की नहीं सच्चे शिष्य की तलाश थी । यहाँ गुरु और शिष्य दोनों का ही उज्जवल पक्ष और चरित्र उजागर हुआ है । सादर ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 16, 2015 at 8:04pm

बहुत ही सकारात्मक सोच वाली प्रेरणास्पद लघु कथा हुई आ० योगराज जी बहुत बहुत बधाई आपको इस शानदार प्रस्तुति के लिए |

Comment by Nita Kasar on September 9, 2015 at 3:30pm
शिष्य को शिक्षक तो बहुत मिलते है हर कक्षा में पर सच्चे गुरू ख़ुशनसीबी और माता,पिता के ज़रिये बतौर मार्गदर्शक मिलते है वे ही शिष्यों के सच्चे पथप्रदर्शक होते है कथा सराहनीय ही नहीं सारगर्भित भी है मेरा नमन स्वीकार करिये आदरणीय योगराज प्रभाकर जी ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 6, 2015 at 8:59pm
छद्म आवरण ओढ़े स्वयंभू गुरुओं के लिये सटीक संदेश है इसके अलावा ये लघुकथा नये रचनाकारों के लिये भी प्रेरक है दिली बधाई आपको इस लघुकथा के लिये
Comment by kanta roy on September 6, 2015 at 6:42pm
वाह !!!!!! अद्वितीय लघुकथा । साहित्य सेवा की सच्ची विद्या का दान देकर गरू सदा ही शीर्ष विराजमान रहते है । शिष्य का बिना भेद भाव विधा का आकलन करने का जो ज्ञान गुरू से मिला वो गुरू चरणों में ही अर्पित हुआ । सच्चे शिष्य गुरू के रिश्ते का आकलन किसी सामान्य व्यक्ति के वश की बात नहीं है । बहुत ही शानदार लेखनी हुई है सर जी । बेहद ही गाम्भीर्य - भाव का संवहन हुआ है इस लघुकथा में । दिल को आनंदित कर गया ।
Comment by jyotsna Kapil on September 6, 2015 at 4:33pm
बहुत ही सुंदर कथा आदरणीय योगराज सर।ऐसे गुरु ही सच्चे अर्थों में शिष्य के हितचिंतक होते हैं।ऐसी सोच आप जैसा व्यक्ति ही रख सकता है जो सदैव नवांकुरों के हित के लिए प्रयत्नशील रहता है।
Comment by Tanuja Upreti on September 6, 2015 at 4:26pm

बहुत सुन्दर और  प्रेरक रचना के लिए शुभकामनाएँ आदरणीय योगेन्द्र जी

Comment by ram shiromani pathak on September 6, 2015 at 3:47pm
वाह आदरणीय ऐसे महान विचार आप जैसे गुरु के ही हो सकते है।।आपकी ये लघुकथा मुझे बहुत पसंद आई।।सादर

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