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ग़ज़ल :- मैं शर्मिंदा नहीं अपने किये पर

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन

भले लिख दो,मिरा ग़म हाशिये पर
मैं शर्मिंदा नहीं अपने किये पर

अँधेरा इस क़दर फैला हुवा था
नज़र सबकी थी छोटे से दिये पर

मिरा कुछ बोझ हल्का हो गया है
मिरे बच्चों ने भी अब ले लिये पर

तुम्हारे हुस्न पर मिसरा लिखा था
कई शर्तें लगी थीं क़ाफ़िये पर

मिरी ग़ज़लो प सर धुंते हैं अपना
ये देंगे दाद मेरे मर्सिये पर

सभी शाइर समझ बैठे हैं उसको
किसी को शक नहीं बहरूपिये पर

"समर",ये लफ़्ज़ बे मतलब है कितना
हमारी जान सदक़े,शुक्रिये पर

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 785

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Comment by Samar kabeer on August 13, 2015 at 10:37pm
जनाब श्री सुनील जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ, "बहरूपिये" वाले शैर पर आप चोक से गए थे,सुनील जी,अस्ल में मेरी ये ग़ज़ल 25 साल पुरानी है,उर्दू मुशायरों में ऐसे शाइरों को सुना जो अस्ल में शाइर ही नहीं थे,किसी को उस्ताद बनाकर उसकी ग़ज़लें अपने नाम से पढ़ने वालों की भरमार हो गई थी,उस मंज़र को देखकर यह शैर कहा था ।
Comment by shree suneel on August 12, 2015 at 11:40pm
बहुत हीं उम्दा ग़ज़ल दी है आपने आदरणीय समर कबीर सर जी.
भले लिख दो,मिरा ग़म हाशिये पर
मैं शर्मिंदा नहीं अपने किये पर.. बहुत ख़ूब मतला
मिरा कुछ बोझ हल्का हो गया है
मिरे बच्चों ने भी अब ले लिये पर... क्या बात है
सभी शाइर समझ बैठे हैं उसको
किसी को शक नहीं बहरूपिये पर... ओह! ये शे'र! हाँ.. ठीक कहा आपने आदरणीय.
हार्दिक हार्दिक बधाइयाँ आपको इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए सर जी. सादर
Comment by Samar kabeer on August 12, 2015 at 11:24pm
जनाब लक्ष्मण धामी जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on August 12, 2015 at 11:22pm
जनाब मनोज कुमार अहसास जी,आदाब,मरने वाले की तारीफ़ में लिखी गई रचना को मर्सिया कहते हैं,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on August 12, 2015 at 11:18pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on August 12, 2015 at 11:17pm
जनाब हर्ष महाजन जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on August 12, 2015 at 11:13pm
जनाब रवि शुक्ल जी, आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on August 12, 2015 at 11:10pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2015 at 11:31am

आ0 समर भाई, इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by मनोज अहसास on August 11, 2015 at 5:04pm
आपकी ताज़ा ग़ज़ल पर बहुत दिल से नमन
खूबसूरत कलाम में अनेको बातें आपने पिरोई है
मर्सिये का अर्थ नहीं पता है हमे
बता देगे तो मेहरबानी होगी
आपकी ग़ज़ल के बारें में बहुत कुछ कहने का मन करता है
पर बस कहुगा नहीं
क्योंकि वो इससे खूबसूरत नहीं हो सकता
इनायत
सादर

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