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बुनियाद (लघुकथा)

''सुनो बंटी के पापा , काहे इतना विलाप करते हो। ''
''बंटी की माँ .... तुम्हें क्या पता ,पिता के जाने से मेरे जीवन का एक अध्याय ही समाप्त हो गया। ''
'' मैं आपके दुःख को समझ सकती हूँ। मुझे भी पिता जी के जाने का बहुत दुःख है लेकिन धीरज तो रखना पड़ेगा। आप यूँ ही विलाप करते रहेंगे तो उनकी आत्मा को चैन कहाँ मिलेगा। '' धर्मपत्नी ने ढाढस देते हुए कहा।
''वो तो ठीक है बंटी की माँ … लेकिन आज पिता के गुजर जाने से न केवल मेरे सिर से वटवृक्ष की छाया चली गयी बल्कि ऐसा लगता है मेरा जीवन की बुनियाद को सींचने वाली बुनियाद ही चली गयी।''

धर्मपत्नी के ढाढस भरे स्पर्श से आंसुओं ने आँखों का साथ छोड़ दिया।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on August 3, 2015 at 2:25pm

आदरणीय  Archana Tripathi  जी आपकी स्नेहिल प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Archana Tripathi on August 3, 2015 at 8:25am
बेहतरीन लघुकथा ,माता-पिता के चले जाने के बाद वाकई में बुनियाद ना होने का अहसास होता हैं ।हार्दिक बधाई आपको सुशील सरना जी ।
Comment by Sushil Sarna on August 2, 2015 at 4:49pm

आदरणीय सौरभ सर लघु कथा के प्रयास पर आपकी ऊर्जावान प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार। सर ''ऐसा लगता है मेरे  जीवन की बुनियाद को सींचने वाली बुनियाद ही चली गयी'' -- इस वाक्य से मेरा अभिप्राय ये था की मेरा पिता मेरे जीवन को सुसंस्कृत करने की बुनियाद थे वो क्या गए मेरे जीवन की बुनियाद को सुदृढ़ करने वाली बुनियाद (मेरे पिता) ही चली गयी। आपकी उपस्थिति का हार्दिक आभार सर। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2015 at 3:07am

ऐसा लगता है मेरा जीवन की बुनियाद को सींचने वाली बुनियाद ही चली गयी -- इस वाक्य के क्या अर्थ हैं ? 

विधा पर इस कोशिश केलिए हार्दिक शुभकामनाएँ आदरणीय सुशील सरनाजी..

 

Comment by Sushil Sarna on August 1, 2015 at 6:41pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी आपकी स्नेहिल प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 3:50pm

आदरणीय सुशील सरना सर, बढ़िया लघुकथा हुई है. हार्दिक बधाई. 

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