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ऐसी दुनिया संभव ही नहीं है 

जिसमें ढेर सारे बाज़ हों और चंद कबूतर

 

बाज़ों को जिन्दा रहने के लिए

जरूरत पड़ती है ढेर सारे कबूतरों की

 

बाज ख़ुद बचे रहें

इसलिए वो कबूतरों को जिन्दा रखते हैं

उतने ही कबूतरों को

जितनों का विद्रोह कुचलने की क्षमता उनके पास हो

 

कभी कोई बाज़ किसी कबूतर को दाना पानी देता मिले

तो ये मत समझिएगा कि उस बाज़ का हृदय परिवर्तन हो गया है

-----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 18, 2015 at 8:27am

कभी कोई बाज़ किसी कबूतर को दाना पानी देता मिले
तो ये मत समझिएगा कि उस बाज़ का हृदय परिवर्तन हो गया है   

गजब का व्यंग्य कसा है आपने ! बहुत बहुत बधाई! 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 17, 2015 at 2:02pm

आ० धर्मेन्द्र जी

बहुत सुन्दर   और  मार्मिक  रचना , अन्योक्ति और सटीक व्यंग,   बहुत बहुत बधाई ,

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 17, 2015 at 11:03am

आदरणीय मिथिलेश जी, आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 16, 2015 at 10:47pm

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी, बाज़ और कबूतर प्रतीकों से कमाल की रचना हुई है, इस गहन प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 16, 2015 at 4:10pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय शरदिन्दु जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 16, 2015 at 4:10pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय कुशवाहा जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 16, 2015 at 4:09pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी, स्नेह बना रहे


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 16, 2015 at 2:09pm

सुष्ठु भाव व्यंजना और पैनी अभिव्यक्ति को मूर्त करती हुई आपकी यह रचना सभी दृष्टि से प्रशंसनीय है आदरणीय.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 16, 2015 at 12:21pm

सही मार्ग दर्शन , आदरणीय , प्रवृत्ति नही बदलती, शायद मुखौटा बदलता हो , 

साधुवाद , बधाई , सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 16, 2015 at 12:13pm

एक वैचारिक कविता कई इंगितो को सापेक्ष करती है. किन्तु उन सभी के मध्य बनी तारतम्यता ही ऐसी कविताओं के सफल होने का पैमाना हुआ करती है. आपकी संवेदनशील प्रस्तुतियों के प्रति हम एक पाठक के तौर पर सदा से आश्वस्त रहा करते हैं. बाज़ और कबूतर को वैचारिक गहनता के साथ आपने प्रस्तुत किया है.

प्रस्तुत कविता की इन पंक्तियों के लिए जितनी प्रशंसा की जाए कम होगा -
बाज़ों को जिन्दा रहने के लिए
जरूरत पड़ती है ढेर सारे कबूतरों की
अद्भुत ! एक समझे-बूझे इंगित को कितना सटीक आयाम मिला है !

बाज ख़ुद बचे रहें
इसलिए वो कबूतरों को जिन्दा रखते हैं
उतने ही कबूतरों को
जितनों का विद्रोह कुचलने की क्षमता उनके पास हो
वाह वाह !

वैसे उपर्युक्त पंक्तियों मे आखिरी पंक्ति, जितनों का विद्रोह कुचलने ...  एक विशिष्ट सोच का परिणाम है, जो आगे निम्नलिखित भाव के साथ शाब्दिक होती है -

कभी कोई बाज़ किसी कबूतर को दाना पानी देता मिले
तो ये मत समझिएगा कि उस बाज़ का हृदय परिवर्तन हो गया है

कविता को कविता ही रहने देने केलिए आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय.. :-))

एवं, इस प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएँ

कृपया ध्यान दे...

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