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पिता की अचानक हुई मौत से वो टूट गया । एकदम ठीक ठाक थे , बस हल्का सा बुखार हुआ और दो दिन में चल बसे । आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही ,पहले माँ और अब पिताजी भी , एकदम से बड़ा हो गया वो । पुरे गाँव में ख़बर हो गयी थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया । चाचा , जो अलग रहते थे घर पर आ गए थे और अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए थे ।
अंतिम संस्कार करके वापस चलते समय मौजूद सभी लोगों को रिवाज़ के अनुसार भरपेट नाश्ता कराकर वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे खर्च का हिसाब दिया तो वो सर पकड़ कर बैठ गया । अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरा गाँव और रिश्तेदारों को खिलाना था ।
शायद इन कर्मकाण्डों में उसके सर से माँ , बाप के बाद खेतों का साया भी उठ जाये, अब वो पूरी तरह से अनाथ हो गया था ।
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on July 14, 2015 at 12:44pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 13, 2015 at 11:35pm

सामाजिक कुव्यवस्था पर आघात करती एक अच्छी लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय

Comment by विनय कुमार on July 7, 2015 at 12:29pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 7, 2015 at 11:02am

आदरणीय , सामाजिक कु प्रथा के ऊपर अच्छी चोट की है , बधाइयाँ ।

Comment by विनय कुमार on July 6, 2015 at 3:32pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय अमन कुमार जी .

Comment by aman kumar on July 6, 2015 at 2:30pm

अनाथ और सनाथ के बाद नाथ यानि आर्थिक सहारा ...... सूक्ष्म विवेचना !बधाई 

Comment by विनय कुमार on July 6, 2015 at 10:54am

बहुत बहुत आभार आदरणीय विजय निकोर जी ..

Comment by vijay nikore on July 6, 2015 at 2:30am

आपने कर्मकांड पर अच्छा प्रकाश डाला है। आपको हार्दिक बधाई, विनय जी।

Comment by विनय कुमार on July 5, 2015 at 10:54pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जान गोरखपुरी जी ..

Comment by विनय कुमार on July 5, 2015 at 10:53pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया नीरज शर्मा जी ..

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