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गीत -- पूछता है अब विधाता - ( गिरिराज भंडारी )

रोक नदिया

तोड़ पर्वत

तू धरा को क्या बनाता

पूछता है , अब विधाता

 

देख कुल्हाड़ी चलाता 

कौन अपने पाँव में ही

कंटकों के बीज बोता

रास्तों में , गाँव मे ही

व्यर्थ सपनों के लिये क्यों आज के सच को  गवांता

तू धरा को क्या बनाता , पूछता है अब विधाता

 

इक नियम ब्रम्हाण्ड का है

ग्रह सभी जिसमें चले हैं

है धरा की गोद माँ की

खेल जिसमे सब पले हैं

माँ पहनती उस वसन में , आग कोई है लगाता 

तू धरा को क्या बनाता , पूछ्ता है अब विधाता

 

है सरलता, राज पथ सी

है तरलता एक  सच ही         

क्या विनाशक सर चढ़ा बन

चुन लिया है  पर कुपथ ही

क्यों सहज से रास्ते पर  तू अभी भी चल न पाता

तू धरा को क्या बनाता , पूछता है अब विधाता

******************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 15, 2015 at 10:02am

आदरणीय बड़े भाई अखिलेश जी , उत्साह वर्धन के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 15, 2015 at 10:01am

आदरनीय निर्मल नदीम भाई , हौसला अफज़ाई का दिली शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 15, 2015 at 10:00am

आदरणीय विजय भाई , उत्साहवर्धन के लिये आपका अबहुत आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 15, 2015 at 10:00am

आदारणीय जितेन्द्र भाई . आपका बहुत आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 15, 2015 at 2:14am

आदरणीय गिरिराज सर बहुत सुन्दर गीत लिखा है आपने 

बहुत बहुत बधाई 

व्यर्थ सपनों के लिये क्यों आज के सच को  गवांता

माँ पहनती उस वसन में , आग कोई है लगाता

क्यों सहज से रास्ते पर  तू अभी भी चल न पाता

तू धरा को क्या बनाता , पूछता है अब विधाता

बहुत सुन्दर 

Comment by shree suneel on May 14, 2015 at 10:07pm
है धरा की गोद माँ की
खेल जिसमे सब पले हैं
माँ पहनती उस वसन में , आग कोई है लगाता
तू धरा को क्या बनाता , पूछ्ता है अब विधाता/
आदरणीय गिरिराज सर, इस सार्थक, सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें. बहुत सुन्दर!
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 14, 2015 at 9:54pm

आदरणीय गिरिराज भाईसाब ,, बिधाता का सवाल के माध्यम से सचेत करती इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 14, 2015 at 1:55pm

बहुत ही बेहतरीन!समसामयिक ज्वलंत रचना हुयी आदरनीय! अभिनन्दन!

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on May 14, 2015 at 12:05pm

पशु पक्षी हमारी तरह बोल पाते तो वे प्रकृति और पर्यावरण पर हमारी क्लास ज़रूर लेते और  प्यार से समझाते एक गुरु की तरह और कुछ स्वार्थी और उदंड लोगों को सींग और चोंच मारकर ।

हार्दिक बधाई , प्रिय  गिरिराज भाई 

Comment by Nirmal Nadeem on May 14, 2015 at 11:43am
बहुत सुन्दर क्या बात है।बधाई।

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