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समय : लघु कथा : हरि प्रकाश दुबे

“साहब एक जरूरी बात करनी है !”

“देख नहीं रहे हो कितना व्यस्त हूँ ,अभी मेरे पास किसी भी बात के लिए समय नहीं है,जाओ बाद में आना !”

“पर साहब लगता है आपकी पत्नी के पास भी समय नहीं है, उनका अभी कुछ देर पहले ही एक्सिडेंट हो गया है, और मैं उनको अस्पताल में.. और उनके पर्स से आपका विजिटिंग कार्ड मिला, आपका फ़ोन बंद था ,तभी मुझे अपने सब काम छोड़कर आपको बताने आना पड़ा !”

“अरे भाईसाहब जल्दी ले चलो मुझे आपका बहुत एहसान होगा !”

“समय की परिभाषा बदल चुकी थी !”

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 18, 2015 at 5:02pm

“समय की परिभाषा बदल चुकी थी !”

उपर्युक्त वाक्य कोई कथन तो है नहीं, बल्कि यह तो रचनाकार की सोच है जो पाठकों से साझा हो रही है. फिर इसे इन्वर्टेड कॉमा में क्यों रख दिया ?

एक बढ़िया लघुकथा केलिए हार्दिक बधाई, आदरणीय हरिप्रकाश जी.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 15, 2015 at 7:44pm

आदरणीय हरि प्रकाश जी,

समय के साथ भागते भागते हम अपने आप को समेटते जा रहे हैं. अपनो के लिये भी समय नहीं है अब.

सादर.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 13, 2015 at 11:20am

शायद "समय" की ही, परिभाषाएं बदली हुई होती है. :)) बहुत-बहुत बधाई आदरणीय हरिप्रकाश जी

Comment by jyotsna Kapil on May 12, 2015 at 10:47pm
बेहद शानदार लघुकथा कही आपने आ हरी प्रकाश दुबे जी।इतनी सुन्दर लघुकथा के लिए बधाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 12, 2015 at 8:32pm

“समय की परिभाषा बदल चुकी थी !”   , खुद की बात आती है तो ऐसे ही परिभाषायें बदल जातीं हैं । बहुत अच्छी लघुकथा कही , आदरणीय हरि भाई ,हार्दिक बधाइयाँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 12, 2015 at 7:41pm

बहुत ही शानदार लघु कथा है जिसकी पञ्च लाइन बहुत कुछ कह जाती है ,हार्दिक बधाई आपको आ० हरि प्रकाश जी. 

Comment by shree suneel on May 12, 2015 at 6:01pm
अच्छी लघु-कथा आदरणीय हरि प्रकाश जी. सार्थक प्रस्तुति के लिए बधाई..
Comment by विनोद खनगवाल on May 12, 2015 at 3:45pm
आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी // "समय की परिभाषा बदल चुकी थी।"// क्या संवाद का हिस्सा ही है क्या?
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 12, 2015 at 10:37am

ज़िंदगी और समय की परिभाषा बदल जाती है एक पल में ....सुंदर प्रस्तुति ....सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 12, 2015 at 4:20am

वाह वाह 

आदरणीय हरिप्रकाश भाई जी बेहतरीन लघुकथा कही है आपने.

बधाई इस प्रस्तुति पर 

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