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“सुनो! कितनी अच्छी हो तुम, कितना प्रेम है तुम्हारे पास मेरे लिए. मेरा शादी-सुदा होना भी तुमने अपनी गहराइयों से स्वीकार लिया है. कुछ कहो न!, ऐसा क्या है मुझमे..?”

“ मुझे, तुमसे सब कुछ मिल रहा है जो किसी से शादी के बाद जो मिलता. और मैं तुमसे अपनी मर्जी तक सम्बन्ध बनाये रख सकती हूँ, क्यूंकि तुम शादी-शुदा होने के कारण, समाज अपने परिवार और क़ानून के डर से मुझसे जबरदस्ती नहीं कर सकते. नहीं तो आजकल के बेचलर...तौबा-तौबा “

   जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 12:33am

आदरणीय जितेन्द्र जी आपकी बेहतरीन लघुकथाएं पढ़ चुका हूँ. 

इस लघुकथा को पढ़कर भी कमेन्ट नहीं कर रहा था लेकिन इस संशोधन के बाद बात थोड़ी खुली है. 

इस नई आधुनिक मानसिकता के चित्रण में थोड़ी और सघनता की गुंजाइश लग रही है. यद्यपि लघुकथा के शिल्प को बिलकुल नहीं समझ पाया हूँ लेकिन एक पाठक के रूप में मुझे गुंजाइश लग रही है. सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 12:33am

आदरणीय कृष्णा जी. आपकी गहन प्रतिक्रिया व् लघुकथा की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 12:27am

आदरणीय लक्ष्मण जी. सर्वप्रथम लघुकथा पर आपके स्नेहिल मार्गदर्शन का हार्दिक आभार. आपकी प्रतिक्रिया //आखिर शादी सुदा होने पर भी अन्य से रिश्ता रखने पर बदनामी का डर क्यों नहीं// व् सुझाव अनुसार मैंने लघुकथा में संशोधन किया है, जिसमे स्पस्टीकरण की पूर्ण कोशिश की है.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 12:20am

आदरणीय डा. विजय जी. लघुकथा पर प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक आभार

सादर!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 5, 2015 at 7:38pm

आ० जितेन्द्र भाई लघुकथा का शीर्षक और बेहतर होना चाहिए था...जो विषय से सीधे तौर पे कनेक्ट हो!!

//क्यूंकि तुम शादी-शुदा होने के कारण, समाज अपने परिवार और क़ानून के डर से मुझसे जबरदस्ती नहीं कर सकते//

''जब तक चाहो जुड़े रहो,अपने मनमाफिक संबंध तोड़ दो,और इस बाबत शादी-शुदा होने के कारण को प्रपंच न कर सके या दबाव न डाल सके'' यानी पूर्ण स्वतंत्रता''....आधुनिक सोच में ढलते रिश्तों! बहुत ख़ूब जितेन्द्र भाई! हार्दिक बधाई

Comment by Shyam Narain Verma on May 5, 2015 at 5:03pm
इस अच्छी लघु कथा के लिए बधाई, आदरणीय
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 5, 2015 at 11:58am

रचना पर लेखक का स्पष्टीकरण किये बगैर पाठक को कहानी समझ आ जाए तभी वह सार्थक लघु कथा है | इस लघु कथा को पढ़कर 

यह स्पष्ट नहीं हो रहा की आखिर शादी सुदा होने पर भी अन्य से रिश्ता रखने पर बदनामी का डर क्यों नहीं | सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 5, 2015 at 11:28am
प्रगति के सोपान पर एक और कदम, बधाई, प्रिय जीतेन्द्र जी, सादर।
Comment by Ravi Prabhakar on May 5, 2015 at 8:28am

/ मुझे तुम्हारे कारण बदनामी का कोई डर भी नही, जो हर लड़की को किसी बेचलर के साथ रहता है...” / मैं समझ नहीं पाया आदरणीय जितेन्‍द्र भाई की विवाहित व्‍यक्‍ित से नाजायज संबंध होने पर बदनामी का डर क्‍यों नहीं है ? कथा कुछ अस्‍पष्‍ट सी लग रही है भाई । शीर्षक भी प्रभावशाली नहीं लगाा । आपसे तो इससे बहुत ज्‍यादा की अपेक्षाएं हैं भाई जी ।

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