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मुझको आता है तरस अब उस क़ज़ा पे

२१२२ २१२२ २१२२
दर्द दिल में ऑसू टपके हैं धरा पे

कुछ लिखूंगा तो लिखूंगा में जफा पे  

तुम न होते ज़िन्दगी में गर मेरी तो
मैं कभी कुछ कह नहीं पाता बफा पे

रख के सर जानो पे मरने की तमन्ना
और मत जिंदा मुझे रख तू दवा पे

लोग जिससे खौफ अब भी खा रहे
मुझको आता है तरस अब उस क़ज़ा पे

गोपियों सा प्रेम दिल में जब भी होगा
कृष्ण भागे आयेंगे तेरी सदा पे

पापियों के पाप से धरती हिली जब
थी कहानी दर्द की वादे सवा पे

लूटती हैं जब ह्वायें ही चमन को 

क्यूँ नहीं इल्जाम तय होता हवा पे 

रूप ये जलवा तुम्हारा जब न होगा
भीड़ गुम होगी जो मरती है हया पे

रुख पे लाली झुकती पलकें देख कर यूं
लुट गए आशू हसीनो की अदा पे
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 3:33pm

आदरणीय आशुतोष भाई , गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ  । आपने सुधार सही किया है ,7 वाँ - बहार और खिंज़ाँ वाले शे र  के विषय मे और सोच लीजियेगा ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 1, 2015 at 3:22pm

बहुत ख़ूब... वीनस जी ने यथोचित टिप्पणी की है जिसपर आपके प्रयास जारी हैं. आपको बधाई
सादर  

Comment by narendrasinh chauhan on May 1, 2015 at 2:25pm

बहुत सुंदर गज़ल.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 1, 2015 at 2:06pm

दर्द दिल में ऑसू टपके हैं धरा पे 

कुछ लिखूंगा तो लिखूंगा मैं जफा पे ....आदरणीय वीनस जी मार्गदर्शन के अनुरूप मैं अपनी समझ से परिवर्तन कर रहा हूँ ..प्रथम शेर को मूल रूप से हटाकर उसकी जगह ये शेर लिखा है ..आपकी प्रतिक्रिया से ही मेरे प्रयास की सफलता निर्धारित होगी सादर ..pahl

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 1, 2015 at 1:53pm

आदरणीय गोपाल सर ..ग़ज़ल को आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया मिली इसके लिए मैं आपका  आभारी हूँ ..आपका मार्गदर्शन और स्नेह मुझे हमेशा मिलता रहा है ..आदरणीय वीनस जी की पैनी नजर से मेरी गलतियां बच नहीं पाती हैं मैंने उनके मशविरे पर अमल करते हुए संशोधन का प्रयास करूंगा सादर प्रणाम के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 1, 2015 at 1:51pm

आदरणीय विजय सर रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 1, 2015 at 1:50pm

आदरणीय वीनस जी ..काफिये में जो गलती हुई है मैं उस बात को समझ गया ..उसे परिवर्तित करने का प्रयास कर रहा हूँ ..वाकई ये बड़ी गलती हुई है ..और ये नहीं होना चाहिए था ...आपका मार्गदर्शन मिला है मैं इसमें संशोधन  करूंगा ..आपका मार्गदर्शन ऐसे ही सतत मिलता रहे ऐसी कामना के साथ सादर धन्यवाद के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 1, 2015 at 1:47pm

आदरणीय केवल जी ..रचना पर आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद ..सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 1, 2015 at 12:19pm

आशुतोष जी

मुझी वीनस भाई की बात समझ में आयी . आप भी गौर करें .. गजल की  कहन  अच्छी है . सादर .

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 1, 2015 at 1:39am
डॉo आशुतोष मिश्रा जी , प्रयास सराहनीय है, बधाई, सादर।

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