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" अब्बू ,ये नकाब और ये बुर्का? मैं नहीं पहनूंगी बस। "कहते हुए नीलोफर बाहर निकल गयी।
"क्या आप भी नीलोफर के अब्बा।ज़माना बदल गया है।आप भी बदल जाइए न।"
"कैसे बताऊँ तुमलोगों को बेग़म। ज़माना बिलकुल भी नहीं बदला है।बल्कि और भी बदतर हो गया है लड़कियों के लिए।"
कहते हुए हुए सिद्दकी साहब के जहन में वे सारी एक्स रे जैसी निगाहें घूमने लगीं जो कल बाज़ार में उनकी मासूम बच्ची के शरीर को छेदती हुई उनके दिल में सुई की तरह चुभ रही थीं।

.

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Mala Jha on April 24, 2015 at 4:11pm
पंकज जोशी जी सप्रेम धन्यवाद।मेरी पहली रचना के लिए आपने जो तारीफ़ की उसका मै तहे दिल से शुक्रिया करती हूँ।
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 23, 2015 at 10:30pm
वैचारिक प्रस्तुति, बधाई , आदरणीय सुश्री माला झा जी , सादर।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 23, 2015 at 9:47pm

अच्छी लघुकथा हुई है, तनिक लघुकथा पर और समय देने की जरुरत थी, कुछ शब्द अधिक हैं जिनके बगैर भी लघुकथा प्रभाव छोड़ने में सफल होती ...जैसे ...

//ज़माना बिलकुल भी नहीं बदला है।बल्कि और भी बदतर हो गया है लड़कियों के लिए//

इस पक्ति को यदि मैं लिखता तो कुछ यूँ लिखता ....

ज़माना बदला नहीं बल्कि और भी बदतर हो गया है.

//कहते हुए हुए सिद्दकी साहब के जहन में // यह कहते हुए सिद्दकी साहब के जहन में .....

इस प्रस्तुति पर बधाई प्रेषित करता हूँ आदरणीया माला झा जी.

Comment by Sudhir Dwivedi on April 23, 2015 at 9:37pm
सुंदर कथा

पिता की आत्म व्यथा का सुंदर चित्रण किया आपने
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 23, 2015 at 8:35pm

आदरनीय माला जी. सर्वप्रथम आपका ओ.बी.ओ. पर स्वागत है. बहुत ही सुंदर सामयिक लघुकथा पर आपको बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 23, 2015 at 8:20pm
प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई।
Comment by Pankaj Joshi on April 23, 2015 at 8:03pm
इतनी सुंदर कथा प्रेषित करने के लिए आपको बधाई.।

कृपया ध्यान दे...

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