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ग़ज़ल - अभी गुफ़्तार में शामिल बहुत इक़रार बाक़ी है ( गिरिराज भंडारी )

1222     1222     1222     1222 

मुझे लूटो कि कांधों में अभी जुन्नार बाक़ी है

मेरे सर पे अभी पुरखों की ये दस्तार बाक़ी है

 

लड़ाई के सभी जज़्बे तिरोहित हो गये यारों

अना से मेल खाता सा कोई हथियार बाक़ी है

 

इशारों ने इशारों की बहुत बातें सुनी, लेकिन  

अभी गुफ़्तार में शामिल बहुत इक़रार बाक़ी है

 

दरारें जिस तरह खाई बनीं इस से तो लगता है

अभी भी बीच में अपने कोई दीवार बाक़ी है

 

गदा बन कर तेरे दर पे बहुत आया मेरे मौला

मेरे घर में, तेरा आना, मगर इक बार बाक़ी है

 

क़िसी टुट पूंजिये को घेर कर इतना न इतराओ

अभी उस पार सीना ठोकता सरदार बाक़ी है

 

अलाने डे फलाने डे मनाते यूँ न बहको तुम  

मेरे बच्चों अभी राखी सा भी त्यौहार बाक़ी है

 

सँभलना, छू नहीं बातों को मेरी, दूर ही रहना

पुरानी है बहुत लेकिन अभी भी धार बाक़ी है

 

किनारा तो किनारा है समझना क्या इसे यारों

सफ़ीनों के समझने को अभी मझधार बाक़ी है

 

जमाने के सभी फेंके हुये पत्थर हटाया, पर

मेरे अपने ने फेंका था वही इक ख़ार बाक़ी है

 

कहीं ऐसा न हो नफ़रत तुम्हारी ख़ुद बदल जाये

मेरे सीने में सागर सा अभी तक प्यार बाक़ी है 

********************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 2:23pm

आदरणीया वन्दना जी , गज़ल की सराहना के लिये आपका आभार ॥

Comment by vandana on March 28, 2015 at 6:38pm

 

दरारें जिस तरह खाई बनीं इस से तो लगता है

अभी भी बीच में अपने कोई दीवार बाक़ी है

सँभल जा , छू नहीं बातों को मेरी, दूर ही रहना

पुरानी है बहुत लेकिन अभी भी धार बाक़ी है

 

किनारा तो किनारा है समझना क्या इसे यारों

सफ़ीनों के समझने को अभी मझधार बाक़ी है

बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय गिरिराज सर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 27, 2015 at 11:16pm

आदरणीय श्याम भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 27, 2015 at 11:15pm

आदरणीय राम अवध भाई , ग़ज़ल को अपका समय देने के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ । गज़ल के मिसरे पर आपकी सलाह क़ाबिले गौर है , और किन्हीं जानकार की सलाह का इंतिज़ार है ! आपका आभर ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 27, 2015 at 11:12pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई ,हौसला अफज़ाई का बेहद शुक्रिया ॥

Comment by Shyam Mathpal on March 27, 2015 at 8:48pm

आदरणीय भण्डारी जी,

दिल को छूने वाली सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on March 27, 2015 at 4:01pm

आदरणीय भण्डारी जी
आप के इस शेर में मेरे विचार से कुछ गड़बड़ी नजर आ रही है
सँभलना छू नहीं बातों को मेरी दूर ही रहना
पुरानी है बहुत लेकिन अभी भी धार बाक़ी है
महाशय सम्हलना आदरसूचक शब्द की ओर इशारा करता है अर्थात किसी गणमान्य व्यक्ति से सम्बाद हो रहा है परन्तु आगे ‘‘छू’’ शब्द किसी छोटे ब्यकित से जिसकी कोई अहमियत नहीं सम्बाद करता हुआ लगता
हैं इसको यूँ कहा जा सकता है
सम्हल जा छू नही बातों को मेरी दूर ही रह तू    -- कुल मिला कर गजल अच्छी है बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 27, 2015 at 11:59am

आदरणीय जितेन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई का दिली शुक्रिया ॥

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 27, 2015 at 11:46am

बहुत खूबसूरत गजल. हर एक शेर तारीफ़ के काबिल, दिली बधाई कुबुलें आदरणीय गिरिराज जी.

सादर!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 26, 2015 at 11:21pm

आदरणीय समर कबीर भाई , आपका बहुत बहुत शुक्रिया , शंका समाधान के लिये । कोई जानकार अगर प्रश्न उठाये तो शंका हो ही जाती है , आपने ज़िम्मेदारी समझी और समाधान किया दिल को बहुत अच्छा लगा ! शुक्रिया आपका ॥

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