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इक ग़ज़ल (आईने भी ज़बान रखते हैं !! )

आज हम भी मकान रखते है
साथ अपना जहान रखते है !!

प्यार से देख लो जरा तुम भी
आईने भी ज़बान रखते हैं !!

जिंदगी में कमी नहीं कोई
इसलिए कुछ  गुमान रखते है !!

तुम हमें छोड़ कर नहीं जाना |
तुम में* हम अपनी*जान रखते हैं ||

साथ उनके रहे सभी अपने,
खास सबका भी* मान रखते है !!

फूल कितने खिलाय आँगन में
वो बहुत घर का* ध्यान रखते है !!

है सभी काम का पता उनको !
वो तजुर्बा तमाम रखते है !!  


(अप्रकाशित और मौलिक )
** आलोक **

मथुरा

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 28, 2014 at 2:25pm

आदरणीय शिज्जु भाई ... जहाँ मात्रा गिराई जाती है वहां चिन्हित करना अच्छा प्रयोग है इससे हम जैसे नौसिखियों को मात्रा गिराने के उदाहरण सहजता से मिल जायेंगे... मैं खुद ऐसा ही प्रयोग तरही मुशायरे में  अपनी टिप्पणी में कर चुका हूँ बस मैं अंडरलाइन करता हूँ जैसे  

\\खास सबका भी मान रखते है \\


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 28, 2014 at 1:18pm
बात सही हैं उसके लिए सितारों की ज़़रूरत है क्या??? पाठक स्वयं समझ जायेंगे कि मात्रा कहां कहां गिरी है

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 27, 2014 at 9:45pm

आदरणीय आलोक मित्तल जी बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने .....बधाई स्वीकार करें।

Comment by somesh kumar on December 27, 2014 at 8:10pm

पहले ,तीसरे और अंतिम शे'र विशेष पसंद आए ,सद्प्रयास हेतू बधाई 

Comment by Anurag Prateek on December 27, 2014 at 8:05pm

है सभी काम का पता उनको !
वो तजुर्बा तमाम रखते है !! 

इतनी कामयाब ग़ज़ल में,‘तमाम’ काफ़िया कहाँ से ले आए मोहतरम? 

Comment by Anurag Prateek on December 27, 2014 at 8:03pm

सितारे के पास मात्रा गिरी है शिज्जू जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2014 at 6:38pm

आदरणीय आलोक मित्तल जी अच्छी ग़ज़ल हुई है, खासतौर पर मतला और ये शेर अच्छा लगा

जिंदगी में कमी नहीं कोई
इसलिए कुछ गुमान रखते है !!

लेकिन बीच बीच में सितारे क्यों हैं

कृपया ध्यान दे...

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