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यार बैरी बना आशिकी के लिये |

शोर होता रहा रोशनी के लिये |
लोग लड़ते रहे चाशनी के लिये |

बेबसी का नज़ारा न देखा कोई ,
मार होती रही चाँदनी  के लिये |

लूट मचती रही चीख होता रहा , 
अश्क गिरते रहे ज़िंदगी के लिये |

हाथ बाँधे खड़े देखते रह गये ,   
घर जला आग में दोस्ती के लिये |

नाव डूबी वहीँ आब ना था जहाँ ,
यार बैरी बना आशिकी के लिये | 

श्याम नारायण वर्मा 
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 571

Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on December 18, 2014 at 10:01am

अनुमोदन और सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 18, 2014 at 12:35am

शोर होता रहा रौशनी के लिये |
लोग लड़ते रहे ढीबरी के लिये |

बेबसी का नज़ारा न देखा कोई ,
मार होती रही चाकरी के लिये |

लूट मचती रही शोर  होता रहा , 
अश्क गिरते रहे ज़िंदगी के लिये |

हाथ बाँधे खड़े देखते रह गये ,   
घर जला आग में दोस्ती के लिये |

नाव डूबी वहीँ आब कम था जहाँ ,
यार बैरी बना आशिकी के लिये | 

आदरणीय श्याम वर्मा जी आपने सुन्दर सर्जना की और  सुझाओं के बाद एक बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल हो गई .... बधाई 

ये ग़ज़ल आज तो राधिका हो गई 

श्याम जीता रहा शायरी के लिए |

Comment by Shyam Narain Verma on November 25, 2014 at 2:54pm

आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी और केतन कमल जी सही राय देने के लिए आप लोगों का बहुत बहुत आभार |

सादर ..............

Comment by Ketan Kamaal on November 25, 2014 at 12:18pm

Bahut achche sujhaav diye hai Ganesh Ji ne waaah achchi koshish hai sahab kahte rahiye qamyabi milegi zaroor duaa karta hun 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 24, 2014 at 11:14am

 लूट मचती  रही  चीख होता रहा  i इसमें चीख होता रहा के स्थान पर शोर होता रहा कर सकते है i बाकी  गजल अच्छी है i

Comment by Shyam Narain Verma on November 24, 2014 at 10:12am

बहुत बहुत धन्यवाद जी ,  आपका हार्दिक आभार  |

सादर ........................


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2014 at 6:09pm

//शोर होता रहा रोशनी के लिये |
लोग लड़ते रहे चाशनी के लिये |//

शोर होता रहा रौशनी के लिये |
लोग लड़ते रहे ढीबरी के लिये |

मतला को सुधारा है ताकि काफिया सही हो सके, वरना प्रस्तुत ग़ज़ल खारिज हो जाती .

//बेबसी का नज़ारा न देखा कोई ,
मार होती रही चाँदनी के लिये |//

बेबसी का नज़ारा न देखा कोई ,
मार होती रही चाकरी के लिये |

काफिया बदला है ताकि दोनो मिसरो मे रब्त हो सके . शेष सभी अशआर बढ़िया हैं, बहुत बहुत बधाई आदरणीय .

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