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पूजा का वो थाल लगी

साड़ी में जैसे फाल लगी

डाली में जैसे डाल लगी

 

मैं भी कुछ खिल जाउंगा

वो आके जब गाल लगी

 

धीरे से पाती खोल रहीं

तबले पे जैसे ताल लगी

 

नज़रों की  चोली ओढ़ेगी

मालों में  जो माल लगी

 

असीर हैं  अनचाहे हम  

मछली का वो जाल लगी

  

इत्र गुलाबी  खुशबू फैली

पूजा का वो थाल लगी

 

अजब सलीके कत्ल किया

चैन की वो ही काल  लगी

 

गाली भी  खिल जाएगी

मुखड़े से जब लाल लगी

चाल पैंतरों से वाकिफ न था

अरि की  पहली ढाल लगी

मैं नयनों से हाला पी बैठा

लहरीदार एक  चाल लगी

कितनों  की नीद ले उड़ी  

लड़की नहीं  भूचाल लगी 

@आनंद 31/10/2014

"मौलिक व अप्रकाशित" 

 

 

 

Views: 528

Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 5, 2014 at 4:00pm

बेहतर प्रयास i  साधुवाद i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 4, 2014 at 5:29pm
बहुत सुन्दर भाई आनन्द जी , बधाई ।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 4, 2014 at 12:18pm

सुंदर प्रस्तुति -

इत्र गुलाबी  खुशबू फैली

पूजा का वो थाल लगी------वाह !

Comment by somesh kumar on November 2, 2014 at 12:39pm

सुंदर,अदभुत 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 2, 2014 at 7:16am

बहुत खूब

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