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ग़ज़ल - धरती दीपक से जगमगानी है - पूनम शुक्ला

2122 2212 22
फिर अमावस की रात आनी है
हमने भी पर लड़ने की ठानी है


है अँधेरा औ चाँद खोया फिर
ये तो पहचानी इक कहानी है


रात आएगी जग छुपा लेगी
धरती दीपक से जगमगानी है


ऐ खुदा तुमने तो सजा दी थी
प्रेम की ये भी इक निशानी है


गम के भीतर ही सुख छुपा होगा
बात ये भी तो जानी मानी है


बीज सूरज के आओ बो दें फिर
खेती आतिश की लहलहानी है


चल अमावस को फिर बना पूनम
ये तो आदत तेरी पुरानी है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित
पूनम शुक्ला

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Comment

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Comment by MAHIMA SHREE on October 19, 2014 at 7:20pm

अच्छी प्रस्तुती हार्दिक बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on October 17, 2014 at 10:19am

" बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें । "

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 17, 2014 at 9:32am

बीज सूरज के आओ बो दें फिर
खेती आतिश की लहलहानी है......बहुत खूब. इस शेर पर विशेष बधाई आपको , आदरणीया पूनम जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 16, 2014 at 6:59pm

बीज सूरज के आओ बो दें फिर
खेती आतिश की लहलहानी है


चल अमावस को फिर बना पूनम
ये तो आदत तेरी पुरानी है ========= अच्छी गजल  i

Comment by Pawan Kumar on October 16, 2014 at 4:39pm

सुन्दर गजल के लिए सादर बधाई!

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