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पत्थरों को राह के हरदम खला है

२१२२         २१२२       २1२२  

जब भी सागर बनने इक दरिया चला है 

पत्थरों को राह के हरदम खला है 

जूझते दरिया पे जो कसते थे ताने 

आज जलवे देख हाथों को मला है 

यूं नहीं बढ़ता है कोई जिन्दगी में

बढ़ने वाला रात दिन हरदम चला  है

अपने ही हाथों से रोका था हवा को  

तब कहीं ये दीप आंधी में जला है

दोस्तों जिस को गले हमने लगाया 

बस रहा अफ़सोस उसने ही छला है 

मौलिक व अप्रकाशित 

 

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Comment by MAHIMA SHREE on October 7, 2014 at 8:08pm

यूं नहीं बढ़ता है कोई जिन्दगी में

बढ़ने वाला रात दिन हरदम चला  है.....वाह बेहद उम्दा ग़ज़ल कही है ...दाद कुबूल करे 

Comment by Santlal Karun on September 20, 2014 at 11:06pm

आदरणीय डॉ. आशुतोष मिश्र जी,

"यूं नहीं बढ़ता है कोई जिन्दगी में

बढ़ने वाला रात दिन हरदम चला  है"

.. प्रभावी ग़ज़ल के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 20, 2014 at 1:36pm

आदरणीय विजय जी ..बस आपका स्नेह यूं ही मिलता रहे  सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 20, 2014 at 1:36pm

आदरणीय श्याम नारायण जी ..हौसला आफजाई के लिए हार्दिक धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 20, 2014 at 1:35pm

आदरणीय नरेन्द्र जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 20, 2014 at 1:34pm

आदरणीय गिरिराज भाईसाब ..आपके मशविरे पर अमल करते हुए ग़ज़ल में संसोधान केर लूँगा ..आपको हार्दिक धन्यवाद के साथ  सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 20, 2014 at 1:32pm

आदरणीय गिरिराज भाईसाब ..आपके मशविरे पर अमल करते हुए ग़ज़ल में संसोधान केर लूँगा ..आपको हार्दिक धन्यवाद के साथ  सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 17, 2014 at 12:32pm

अपने ही हाथों से रोका था हवा को  

तब कहीं ये दीप आंधी में जला है.........क्या बात कही है. आदरणीय डा. आशुतोष जी दिली बधाई आपको

Comment by khursheed khairadi on September 17, 2014 at 10:09am

अपने ही हाथों से रोका था हवा को  

तब कहीं ये दीप आंधी में जला है

आदरणीय ,आशुतोष सा. अच्छी ग़ज़ल हुई है |ढेरों दाद कबूल फरमाएं 

Comment by harivallabh sharma on September 17, 2014 at 12:08am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुयी है आदरणीय...खास टूर पर ये शेर बहुत लाजबाब...

अपने ही हाथों से रोका था हवा को  

तब कहीं ये दीप आंधी में जला है

दोस्तों जिस को गले हमने लगाया 

बस रहा अफ़सोस उसने ही छला है .....बहुत बधाई आपको.

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