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बेसुध वैतालिक गाते हैं

 

नारी  का   जननी में ढलना

जीवन का जीवन में पलना

 

नभ पर मधु-रहस्य-इन्गिति के आने का अवसर लाते है

बेसुध वैतालिक गाते हैं

 

जग में  धूम मचे   उत्सव की

अभ्यागत के पुण्य विभव की

 

मंगल साज बधावे लाकर प्रियजन मधु-रस सरसाते  हैं

बेसुध वैतालिक गाते हैं

 

आशीषो      के   अवगुंठन   में

शिशु अबोध बंधता बंधन में

 

दुष्ट ग्रहों से मुक्त कराने स्वस्ति लिए ब्राह्मण आते है

बेसुध वैतालिक गाते हैं

 

(मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 16, 2014 at 3:15pm

आ० विजय जी

आपका शत -शत आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 16, 2014 at 3:14pm

आ०  सत्य नारायन जी

आपका अनुग्रहीत हूँ i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 16, 2014 at 11:51am

बहुत ही प्रभावशाली पंक्तियाँ. बधाई आपको आदरणीय डा.गोपाल जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 14, 2014 at 1:18pm
वाह ! आकर्षक. बहुत बहुत बधाई आदरणीय गोपाल नारायण जी .
Comment by Shyam Narain Verma on August 14, 2014 at 10:01am
" सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर............. "

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