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“भाभी, अगर कल तक मेरी राखी की पोस्ट आप तक नहीं पँहुची तो परसों मैं आपके यहाँ आ रही हूँ  भैया से कह देना ” कह कर रीना ने फोन रख दिया|

अगले दिन भाभी ने सुबह ११ बजे ही फोन करके कहा, "रीना राखी पहुँच गई है ”

"पर भाभी मैंने तो इस बार राखी पोस्ट ही नहीं की थी !!! "


(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 12, 2014 at 1:13pm

जी दीदी .मैं आपकी दुहरी मानसिकता वाली बातों से पूर्णत: सहमत हूँ, कभी-कभी यही असंतुलन या संवादहीनता किसी तीसरे की भावनाओं को नही समझ पाता. और शायद वही ननद भी भाभी बनकर तैयार हो जाती है अगले रक्षाबंधन के लिए.

आपके स्नेहिल प्रतिउत्तर हेतु आपका आभार दीदी :-))


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 12, 2014 at 12:54pm

हाँ जितेन्द्र भैया सही कहा आपने किन्तु बहुत फर्क है जो स्त्री रक्षाबंधन पर अपने भाई को देख फूली नहीं समाती वही स्त्री नन्द को इस पावन पर्व पर भी देखना भी नहीं चाहती ये कैसी दुहरी मानसिकता व्पाप्त हो गई आज सोचनीय है 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 12, 2014 at 12:48pm

आदरणीया राजेश दीदी. मेरा यह मानना है कि पैसा अपनी जगह है ख़ास तो एक-दो दिन के लिए आई बहन से जो भैया-भाभी के स्वतंत्र जीवन में एक दखल सा होता है. वो ही ख़ास कारण है इन मनमुटावों का

आपको लघुकथा पर पुन: बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 12, 2014 at 12:03pm

आ० लक्ष्मण भैया ये तो आज की और हर दूसरे तीसरे घर कहानी है  रिश्तों पर पैसा भारी हो रहा है ..आपको ये लघु कथा प्रभावित की हृदय से आभारी हूँ ,शुभकामनायें |

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2014 at 11:22am

आ० राजेश बहन यह तो मेरे घर की कथा कह डाली आपने . इस पर आपको जीतनी भी बधाई कहू वह काम ही है .जब हम रिश्तों को धन से तौलने लगते हैं तो यही हस्र होता है .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 12, 2014 at 10:07am

Saurabh mishra ji ,thanks a lot for your kind words in appreciation of this short story.

Comment by Saurabh Mishra on August 12, 2014 at 12:18am

using Limited words you have explained unlimited feelings


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 11, 2014 at 9:37pm

आ० एस सी ब्रह्मचारी जी,आपने लघु कथा के अनुमोदन में जो पंक्ति उद्दृत की है उनमे बहुत सच्चाई है जो रिश्तों की अहमियत आज नहीं समझ रहा कल उसके जरूरत के वक़्त उसके पास कोई न होगा .पर आज  की  पीढ़ी को ये बात समझ नहीं आती |आपका बहुत बहुत शुक्रिया.सादर  

Comment by S. C. Brahmachari on August 11, 2014 at 9:07pm

आपकी लघु कथा पढ़ते समय कही पढ़ी निम्न पंक्तियाँ याद आ रही थी --- रिश्तों को निभाने के लिए समय निकालिए , वर्ना जब आपके पास समय होगा तब शायद रिश्ते ही न बचे हों । आज के युग मे रिश्ते कैसे बादल रहे हैं ! सोच सोच मन व्यथित हो जाता है ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 11, 2014 at 8:07pm

आ० विजय निकोर जी ,आपको ये लघु कथा पसंद आई सार्थक लगी मेरा लिखना सफल हुआ हार्दिक आभार आपका सादर 

कृपया ध्यान दे...

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