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घर जलाना भी हमारा व्यर्थ अब - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    212
**
मयकदे को अब शिवाले बिक गये
रहजनों  के  हाथ  ताले बिक गये
**
घर  जलाना भी  हमारा व्यर्थ अब
रात  के  हाथों  उजाले  बिक  गये
**
जो खबर थी अनछपी ही रह गयी
चुटकले  बनकर मशाले बिक गये
**
न्याय फिर बैसाखियों पर आ गया
जांच  के  जब  यार आले बिक गये
**
दुश्मनों की अब जरूरत क्या रही
दोस्ती के फिर से पाले बिक गये
**
सोचते  थे नींव जिनको गाँव की
वो शहर में बनके माले बिक गये

**


मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 628

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2014 at 11:13am

आ० वेदिका जी , ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए हार्दिक बधाई .आपने सही फ़रमाया कि जरूरत मीडिया के रवैये पैट भी चोट करने कि जरूरत है . प्रयास करूंगा कि इस पर कोई सार्थक ग़ज़ल पेस हो और आपकी उम्मीदों पर लेखनी खरी उतरे .शुभ शुभ ....

Comment by वेदिका on August 11, 2014 at 12:04pm
बहुत बेहतरीन गजल की पेशकश हुयी है। न्याय व्यवस्था पर करीने से चोट की है तो मिडिया के बिकाऊपन भी जोरदार तंज है।
इन्ही संदर्भ में अब गजल की जरूरत है। दिली बधाई लीजिये
सादर!!
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2014 at 11:10am


आदरणीय भाई गिरिराज जी, गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2014 at 11:10am


आदरणीय भाई सौरभ जी, उत्साह वर्धन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद स्नेह बनाए रखें । शुभ  शुभ.....

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2014 at 11:10am

भाई रामअवध जी गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2014 at 11:10am


आदरणीय भाई जितेंद्र जी, गजल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2014 at 11:09am


आदरणीय भाई नरेंद्र सिह जी, गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2014 at 11:09am


आदरणीय भाई आशुतोष जी, आपको गजल की गेयता पसंद आयी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2014 at 11:09am

आदरणीय भाई गोपालनारायन जी ,गजल का अनुमोदन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 10, 2014 at 9:21am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है , आदरणीय लक्ष्मण भाई , आपको दिली बधाइयाँ |

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