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नित्य प्रति दिनकर,संग आके किरनों के,
बड़े प्यार ही से सारे ,जग को जगाता है।
तप करता है जब,खुद ही को जला जला,
सारी धरती को रवि,तभी तो तपाता है।
सुप्त हुए सब अंग,काले काले सब रंग,
लाके साथ सप्त रंग,जग को हँसाता है।
दिन रात आते जाते,भ्रम अपना बनाते,
सूरज तो कभी कहीं,आता है न जाता है
सीमाहरि शर्मा 1.08.2014
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by seemahari sharma on August 5, 2014 at 9:28pm
ह्रदय से आभार Dr.Prachi Singh जी अनुग्रहित हूँ आपकी प्रतिक्रिया से सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 5, 2014 at 11:51am

दिनकर की  महिमा की सुंदर प्रस्तुति आ० सीमा हरि शर्मा जी 

हार्दिक बधाई 

Comment by seemahari sharma on August 4, 2014 at 8:56pm
बहुत बहुत शुक्रिया ram shiromani pathak जी
आपने अच्छा सुझाव दिया है अभी मुझे पता नही यहाँ एडिट कैसे किया जाता है देखती हूँ। आभार आपका।
Comment by seemahari sharma on August 4, 2014 at 8:49pm
आभार रमेश कुमार चौहान जी सादर।
Comment by seemahari sharma on August 4, 2014 at 8:48pm
आभार JAWAHAR LAL SINGH जी सादर।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 3, 2014 at 8:53pm

बहुत ही सुन्दर!

Comment by रमेश कुमार चौहान on August 3, 2014 at 8:25pm

अति सुंदर

Comment by ram shiromani pathak on August 3, 2014 at 8:19pm

बड़े प्यार से सारे ही,जग को जगाता है।=बड़े प्यार से ही सारे,जग को जगाता है।..इसे ऐसा कहें तो 

सुन्दर घनाक्षरी आदरणीया।हार्दिक बधाई आपको। । सादर

Comment by seemahari sharma on August 2, 2014 at 11:26pm
आभार Meena pathak जी।
Comment by seemahari sharma on August 2, 2014 at 11:24pm
आभार आ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी।

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