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लघुकथा : भुट्टे वाली (गणेश जी बागी)

            "भुट्टे ले लो, हरे ताजे भुट्टे ले लो !" हर रोज सुबह-सुबह मैले कुचैले कपडे पहने, सर पर टोकरी लिए भुट्टे वाली कॉलोनी में आ जाती थी, मैं तो उसकी आवाज़ से ही जगता था ।

                    आज सुबह किसी की तेज डाँटने की आवाज़ सुनकर बालकोनी में चला आया, भुट्टे वाली महिला को मेरे पडोसी सिंह साहब डाटे जा रहे थे।

                   "कमबख्त सुबह सुबह चिल्ला कर नींद हराम कर देती है, चैन से सोने भी नहीं देती, अगर कल से इस कॉलोनी में चिल्लाई तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा"

                    भुट्टे वाली के आँखों में आँसू थे, जाते-जाते केवल यही कह पायी, "बाबूजी माफ़ कर दीजिये, लेकिन का करूँ, अगर न चिल्लाऊं तो मेरे बच्चे चैन से नहीं सो पायेंगे ।"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 21, 2014 at 9:38pm

प्रिय वैद्यनाथ सारथी जी, लघुकथा पर आपकी टिप्पणी उत्साहवर्धन करती है, आभार आपका।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 21, 2014 at 9:35pm

लघुकथा आपको अच्छी लगी,लेखन कर्म सार्थक हुआ आदरणीया वेदिका जी, आभार व्यक्त करता हूँ।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 21, 2014 at 9:20pm

उन्हें तो बस चैन से, देर तक सोना है किसी दूसरे की बेचैनी से क्या फर्क पड़ता है. बहुत अच्छी लघुकथा आदरणीय बागी जी, आपको बहुत-२ बधाई

Comment by कल्पना रामानी on July 21, 2014 at 9:15pm

उत्कृष्ट लघुकथा के लिए आपको दिली बधाइयाँ आदरणीय बागी जी

Comment by Saarthi Baidyanath on July 21, 2014 at 8:53pm

अद्भुत सृजन ! एक आम दृश्य, आपकी लेखनी के स्याही से गुजरकर विशेष प्रतीत हो रही है ! साधुवाद मान्यवर ...! सादर नमन :)

Comment by वेदिका on July 21, 2014 at 8:28pm
अपने तथा कथित सुख के लिए दूसरों का जीवन का आधार भी क्या दांव पर लगा सकता है कोई .....??????
दैनिक जीवन से अनमोल मोती चुरा कर आपने ह्रदय द्रवित कथा प्रस्तुत की।
बधाई आदरणीय बागी जी!

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