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सपनो का गाँव,
पीपल की छावो,
नदी का वह तट ,
नहाती जहाँ झट -पट
किनारे के लोग कभी
नहीं देखते थे एकटक .
बदल गए वो भाव
बदल गया गाँव,
झूमर औ गीत गए
रिश्ते अब रीत गए
लक्ष्मी जब भाग गई
आँखों की लाज गई
अब दीदे हुए बेशर्म
गाँव का माहौल गर्म
आतंक, भूख , भय
राजनीती देती प्रश्रय
सुख गए अब खेत,
माटी बन गई रेत,
भागे सब शहर को
कौन करे अब सेत.
पसर रहा है मौन
जिम्मेवार है कौन?
विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 10, 2014 at 11:59pm

आदरणीय विजय प्रकाशजी.. ऐसा आपऔर हम क्या छन्दशिरोमणि तुलसीदास तक कहते पाये जाते हैं - 

न जानामि योगं जपं नैव पूजां.. नतोहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ...

यानि, मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही.. हे शम्भो, मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ..

नमन..

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 10, 2014 at 11:37pm

आ० सौरभ जी,
आपका सचेतक मिला पर मेरा चेतन संज्ञान ले पाये तब बात बने,मैं यथासंभव प्रयत्न करता रहूँगा.
"पूजा की विधि नहीं जानता, फिर भी नाथ चला आया". सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 10, 2014 at 11:23pm

कविताकर्म के लिए बधाई, आदरणीय. एक सार्थक प्रश्न का विन्यास गढ़ती इस रचना के होने पर हार्दि शुभकामनाएँ.

वैसे, अब अपेक्षा है कि प्रस्तुतीकरण के प्रति भी हम सचेत हों.

शुभ-शुभ

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 6, 2014 at 7:40pm

आ० आशुतोष जी, इस रचना पर आपने भेजी बधाई, बहुत धन्यवाद सह अभिनदंन.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 6, 2014 at 7:37pm

प्रिय अनंत जी, आपको रचना पसंद आयी और आपने भेजी बधाई,
आपको बहुत धन्यवाद सह आभार

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 6, 2014 at 5:07pm

आदरणीय विजय जी   वर्तमान परिदृश्य में हो रही तबाही का मंजर आपने शसक्त रचना के माध्यम से किया इसके लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 6, 2014 at 4:52pm

आदरणीय चिंतनीय विचारणीय सत्य कहा है आपने बहुत ही सशक्त प्रस्तुति आदरणीय हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 6, 2014 at 11:08am

आ० संतलाल करुण जी,
रचना के भावो आपको अच्छे लगे और आपने साधुवाद दिया.आपका अभिनन्दन सह आभार.

Comment by Santlal Karun on July 6, 2014 at 7:53am

आदरणीय शर्मा जी,

आज के ग्रामीण यथार्थ को आप ने व्यंग्य-कविता के माध्यम से संक्षेप में कह दिया है--- 

"किनारे के लोग कभी 
नहीं देखते थे एकटक."

         ***

"अब दीदे हुए बेशर्म 
गाँव का माहौल गर्म
आतंक, भूख , भय 
राजनीती देती प्रश्रय 
सुख गए अब खेत,
माटी बन गई रेत,"

... सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 5, 2014 at 5:09pm

आ० डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,
आपने सराहा, मान दिया ,अहोभाग्य हमारे.
अकिंचन का आभार सह अभिनन्दन स्वीकारें.

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