For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल- ज़िंदगी क्यूँ तेरा पता ढूँढता हूँ !!

बहर - 2122 / 1212 / 2122 

रेत पर किसके नक्शे पा ढूँढता हूँ !
ज़िंदगी क्यूँ तेरा पता ढूँढता हूँ !!

किस ख़ता की सज़ा मिली मुझको ऐसी 
माज़ी में अपने ,वो ख़ता ढूँढता हूँ !!

य़क सराबों के दश्त में खो गया मैं
अब निकलने का रास्ता ढूँढता हूँ !!

दौरे गर्दिश में संग ,गर चल सके जो
कोई ऐसा मैं हमनवा ढूँढता हूँ !!

रौशनी थी मुझे मयस्सर कब आखिर
फिर भी क्यूँ कोई रहनुमा ढूँढता हूँ !!

.

चिराग़ [June 28,2014]

पूर्णतः मौलिक एवम् अप्रकाशित

Views: 921

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 4:16am

किस ख़ता की सज़ा मिली मुझको ऐसी 
माज़ी में अपने ,वो ख़ता ढूँढता हूँ !!.. .  वाह !

दाद कुबूल करें

Comment by Santlal Karun on July 4, 2014 at 5:18pm

केडिया जी, ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2014 at 9:32am

आ0 भाई चिराग जी बेहतरीन गजल हुई है ।हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

Comment by बृजेश नीरज on July 1, 2014 at 7:26am
अच्छी ग़ज़ल। आपको बधाई।
Comment by अरुन 'अनन्त' on June 30, 2014 at 5:51pm

केदिया चिराग भाई अच्छी ग़ज़ल कही है आपने मेरी ओर से बधाई स्वीकारें. प्रयासरत रहिये आपसे और बेहतर कहन की अपेक्षा है.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 30, 2014 at 2:00pm

आदरणीय चिराग भाई , मै अपनी बिना सोचे समझे दिये सलाह के लिये शर्मिन्दा हूँ , आपभी रोकियेगा नही शर्मिन्दा होने से  ॥ सच है कि मै ढूँढता के आ को काफिया मान बैठा था । कचरे मे डालिये मेरी सलाह को । सादर ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 30, 2014 at 11:14am

खेद और क्षमा के साथ मैं गिरिराज जी की बात का समर्थन वापस लेती हूँ ,वैसे उनके कहने के मकसद से प्रभावित होकर काफिया पर ध्यान नहीं दिया,अब आपके कहने पर गौर किया सच है यहाँ सहर आ ही नहीं सकता ,आ० गिरिराज जी भी यही गलती कर बैठे शायद ,ढूँढता को काफिया और हूँ को रदीफ़ समझ बैठे ,एक बार फिर से इस शानदार ग़ज़ल की बधाई 

Comment by Kedia Chhirag on June 30, 2014 at 11:06am

आप सबने जो स्नेह और प्यार दिया उसके लिये मैं तहे दिल से आप सबका शुक्रगुज़ार हूँ ...गिरिराज जी आपके सुझाव निस्संदेह बहुत ही उम्दा है लेकिन एक दिक्कत ये है की ग़ज़ल में "आ" काफिया मुंसलिक किया है ..जैसे नक़्शे पा ,पता ,खता ,रास्ता ,हमनवा -ऐसे में रहनुमा हमकवाफी होता है इसलिए "सहर ढूँढता हूँ"ये ग़ज़ल में जा नहीं रहा ...वैसे शेर ए आखिरी में ये कहना चाहा था ..
रौशनी थी मुझे मयस्सर कब आखिर

फिर भी क्यूँ कोई रहनुमा ढूँढता हूँ !!

यहाँ मैंने रौशनी को पथप्रदर्शक के रूप में लिया है ...यानि राहें अँधेरी हैं ...जहाँ पथप्रदर्शन को रौशनी चाहिए ...यहाँ गुरु या उस्ताद या रहनुमा के लिये रौशनी की उपमा दी है ..और इस लिये मिसरा ए उला में रहनुमा का काफिया बाँधा है...जिन्दगी में पहली बार ग़ज़ल कहने की गुस्ताखी की इसलिए शायद शेर अन्तर्निहित को स्पष्ट करने में समर्थ नहीं हुआ ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 29, 2014 at 4:27pm

चिराग जी बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई ,आ० गिरिराज जी के सुझाव का मैं भी समर्थन करती हूँ |आपको ग़ज़ल की बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 29, 2014 at 12:03pm

आदरणीय चिराग भाई , अच्छी गज़ल कही है , आपको दिली बधाइयाँ ।

अंतिम शेअर मे दोनो मिसरों में मै सम्बंध  नही बैठा पाया , अगर ऐसा कहें तो --

रौशनी थी मुझे मयस्सर कब आखिर
फिर भी क्यूँ ,मै कोई सहर ढूँढता हूँ !!   ---- शायद अच्छा लगे । सोचियेगा ॥

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
1 hour ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
1 hour ago
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
Friday
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
Friday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
Friday
Sushil Sarna posted blog posts
Friday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service