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एकलव्य - पंकज त्रिवेदी

प्रायश्चित करना चाहिए 
गुरु द्रोण को...
जिन्होंने अपने ज्ञान को 
सीमित रखा उन महाराजा के 
वंशजों के लिए और 
ज्ञान से वंचित रहने लगा 
वो वनवासी !

जिसने सिर्फ मिट्टी के 
गुरु को स्थापित किया 
और धनुर्विद्या में 
महारत हांसिल की |

* * *

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 8, 2014 at 4:17pm

सही कहा आदरणीय पंकज त्रिवेदी जी 

ज्ञान को एक वर्ग/वंश विशेष के लिए ही सीमित रखना किसी तरह उचित नहीं..

ज्ञान से वंचित रहने लगा 
वो वनवासी !

जिन्होंने सिर्फ मिट्टी के................मुझे लगता है यहाँ जिसने होना चाहिए...क्योंकि ऊपर की पंक्ति में एक वचन में बात कही गयी है.
गुरु को स्थापित किया 
और धनुर्विद्या में 
महारत हांसिल की |

इस रचना पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारिये..आपकी प्रस्तुतियों का इंतज़ार रहता है आदरणीय 

सादर.

Comment by Pankaj Trivedi on July 5, 2014 at 9:56pm

मीना जी, 

मेरे होने न होने से कोइ फर्क नहीं पड़ता... 

लोग आते हैं, मिलते हैं, बिछड़ते हैं... चक्रव्यूह सी ज़िंदगी फिर भी चलती है...   

Comment by अरुन 'अनन्त' on June 30, 2014 at 5:42pm

सटीक अभिव्यक्ति पंकज जी

Comment by Pankaj Trivedi on June 30, 2014 at 5:08pm

आदरणीय डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी. श्री जीतेन्द्र 'गीत' जी, आदरणीय श्री लक्ष्मण जी और सम्माननीय मीना पाठक जी,

आप सभी के शब्दों से मेरी रचना का बहुमान हुआ है... बहुत दिनों बाद आया हूँ यह बात सही है... कभी कभी विद्वानों की विद्वता हम जैसे गँवार के पल्ले नहीं पड़ती.... इसलिए सोचा कुछ कहने से बेहतर दूर हो जाना ही ठीक.. !  बहुत से मित्रों के आग्रह का सम्मान करना चाहिए... आप सभी के स्नेह-आशीर्वाद के लिए आभारी हूँ .. 

Comment by Meena Pathak on June 30, 2014 at 2:28pm

आदरणीय त्रिवेदी जी...बहुत दिनों के बाद आप का आगमन हुआ ओबीओ पर...बहुत बहुत स्वागत और रचना हेतु बधाई | सादर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 30, 2014 at 11:33am

गुरु द्रोण के चरित्र पर सुन्दर रचना के लिए बधाई | गुरु द्रोण को जब अपनी अज्ञानता का आभास हुआ तब तक बहत देर हो चुकी थी |

अंत में उन्होंने इतना ही कहा कि मै मोह वश गुरु नहीं रहकर शिक्षित ही रह गया | अब मुझे लोग मेरे संसार से चले जाने के बाद ही 

गुरु कहने वह भी इसलिए कि मेरे शिष्य मुझे गुरु मानते है | 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 29, 2014 at 9:34am

कहाँ कर पाता है कोई प्रायश्चित, बस कहानियां बन जाती है जो सिर्फ पढ़ी जाती रही है. बधाई आदरणीय पंकज जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 28, 2014 at 12:50pm

आदरणीय

अंगूठा मांग  लिया  i बड़े लोगो का प्रायश्चित ऐसा ही होता है i

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