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दंश (लघुकथा) रवि प्रभाकर

“बहन ! आज मुझे काम से लौटने में देर हो जाएगी, तब तक तुम मुन्नी को अपने पास ही रखना।" उस विधवा ने हाथ जोड़ते हुए अपनी पड़ोसन से आग्रह किया।
“पर अब तो तेरा देवर भी गाँव से आया हुआ है, तो फिर.....।”
”इसीलिए तो तुम्हारे पास छोड़ रही हूँ."

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Comment by coontee mukerji on June 26, 2014 at 10:22pm

इस छोटी सी कथा ने बहुत कुछ कह दिया......सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 26, 2014 at 11:20am

आ० रवि प्रभाकर जी , इस लघु कथा के विषय में जितना कहें उतना कम है l अत्यधिक संस्कारहीन हो चुके मानव में हवस के लिए रिश्तों की मानमर्यादा और पवित्रता का शून्य होता भाव आपने जिसप्रकार न्यूनतम शब्दों में आपने उकेरा है, उसकी प्रशंसा के लिए शब्दों की कमी पड़ गयी है l  इस सारगर्भित प्रस्तुति पर कोटि  कोटि  बधाई l   


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 26, 2014 at 11:04am

इस लघुकथा का दंश बहुत तीखा और गहरा  है जो किसी भी संवेदनशील पाठक को सन्न और सुन्न करने में सक्षम है. मेरी दृष्टि में यह एक सफल लघुकथा है जोकि इस विधा के मानकों को पूर्णतय: संतुष्ट करती प्रतीत होती है. इस सारगर्भित प्रस्तुति पर मेरी हार्दिक बधाई प्रेषित है.

Comment by annapurna bajpai on June 25, 2014 at 5:42pm

थोड़े मे बहुत कुछ कह दिया आपने ,  अच्छी लघु कथा हेतु बधाई । 

Comment by Shubhranshu Pandey on June 25, 2014 at 1:54pm

एक विधवा ने अपनी मुन्नी के सम्मान को बचाना सीख लिया..

सुन्दर कथा...

सादर.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 25, 2014 at 12:26pm

बहुत बढ़िया लघुकथा, सच! आज के समय में किससे बचा जाय. बहुत बहुत बधाई आदरणीय रवि जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 24, 2014 at 5:15pm

रिश्तों का घ्रणित चेहरा ......

Comment by Savitri Rathore on June 24, 2014 at 4:55pm

वर्तमान हालात पर कटाक्ष करती मर्मस्पर्शी रचना !

Comment by Meena Pathak on June 24, 2014 at 3:04pm

ओह !!

क्या कहूँ ..बहुत कुछ कह दिया आप ने अपनी लघुकथा के माध्यम से .. किस तरह से हर रिश्ते से भरोसा उठ गया है आज .....बहुत सटीक और सार्थक लघुकथा ...बधाई 

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