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प्रेमगीत : आँखों ने ख़्वाबों के फूल चुने

पलकों ने चुम्बन के गीत सुने

आँखों ने ख़्वाबों के फूल चुने

 

साँसें यूँ साँसों से गले मिलीं

अंग अंग नस नस में डूब गया

हाथों ने हाथों से बातें की

और त्वचा ने सीखा शब्द नया

 

रोम रोम सिहरन के वस्त्र बुने

 

मेघों से बरस पड़ी मधु धारा

हवा मुई पी पीकर बहक गई

बाँसों के झुरमुट में चाँद फँसा

काँप काँप तारे गिर पड़े कई

 

रात नये सूरज की कथा गुने

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:07pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ  Saurabh Pandey जी। स्नेह बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:07pm

बहुत बहुत धन्यवाद Dr.Prachi Singh जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:06pm

बहुत बहुत धन्यवाद Ladiwala जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:06pm

बहुत बहुत शुक्रिया JAWAHAR LAL SINGH जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:06pm

बहुत बहुत धन्यवाद गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया जितेन्द्र 'गीत' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:05pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ Arun जी। स्नेह बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:04pm

बहुत बहुत धन्यवाद rajesh kumari जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 11, 2014 at 10:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया Meena Pathak जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 12:30am

प्रस्तुत प्रेमगीत के माध्यम से नवीन बिम्ब-संरचना को स्वर मिला है. 

हार्दिक बधाइयाँ आदरणीय धर्मेन्द्रजी.

कृपया ध्यान दे...

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