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नत्था जैसी हो गई छत्तीसगढ़ के अन्नदाताओं की हालत

छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में अगर अन्नदाता आत्महत्या करने लगे तो, सोचा जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है। छत्तीसगढ़ जहां की अधिकांश आबादी कृषि कार्य पर निर्भर है और इस कृषि के काम को करने वाला टाटा या अम्बानी जैसे उद्योगपति नहीं बल्कि, एक आम किसान है, जो दिन रात एक करके फसल को तैयार करता है, उसे आज सरकारी मदद के आभाव में कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। साल दर साल कर्ज के बोझ से असहाय किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। इस तरह छत्तीसगढ़ में अन्नदाताओं की हालत चर्चित फिल्म ‘पीपली लाइव’ के ‘नत्था’ जैसी हो गई है। सरकारी मदद के अभाव में मजबूर अन्नदाताओं के खुदकुशी के लिहाज से छत्तीसगढ़ चौथा बड़ा पीपली स्टेट बन गया है।
पिछले दिनों जारी राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से वर्ष 2009 में छत्तीसगढ़ में 1802 किसानों ने आत्महत्या की है, जबकि कृषि संबंधित मामलों के जानकार मानते हैं कि छत्तीसगढ़ से संबंधित ये आंकड़े वर्तमान 1802 से भी ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि इस तरह की आत्महत्याओं का सही ढंग से आकलन नहीं किया जा रहा है। महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व कर्नाटक के बाद सबसे ज्यादा खुदकुशी के मामले छत्तीसगढ़ में सामने आए हैं। इस मसले पर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रामनिवास का कहना है, छत्तीसगढ़ में एक भी किसान ने कृषि संबंधित परेशानी के कारण आत्महत्या नहीं की है, जबकि राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने ग्रामीण इलाकों में हुई आत्महत्याओं को किसानों की आत्महत्या मान लिया गया है। मेरा मानना है कि पुलिस की ओर से थाना स्तर पर जिस तरह आत्महत्याओं के मामले निपटाए जाते है,ं उससे उनके वास्तविक कारणों का पता नहीं चल पाता है। क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के यह आंकड़े राज्य की पुलिस की ओर से ही भेजे जाते हैं। मगर ये कहीं नहीं बताया जाता है कि आत्महत्या करने वाले ने आर्थिक कारणों से ऐसा किया है। गंभीर बात यह है कि अधिकतर मामलों में पुलिस अन्य कारणों का उल्लेख करते हुए मामले का निपटारा कर देती है। किसानों की आत्महत्या का एक सबसे बड़ा कारण है आर्थिक तंगी। जबसे किसानों की आत्महत्या के मामले उजागर होने लगे, तबसे पुलिस ने किसानी की वजह से आत्महत्या के खाने को एक तरह से हटा ही दिया है। उसकी जगह पर अब अज्ञात कारणों से आत्महत्या लिखना सरल और सहज समझा जाने लगा है। छत्तीसगढ़ में आत्महत्या करने वालों में से 33 प्रतिशत किसान हैं, लेकिन इसकी थोड़ी चिंता भी सरकार को नहीं है। आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार को सरकार मुआवजा न देने के सौ बहाने बनाती है। अगर जमीन बाप के नाम पर है और सारा काम बेटा करता है और भूखमरी के हालत में आत्महत्या कर लेता है तो सरकार उस किसान की आत्महत्या को गणना में नहीं लेती है। क्योंकि खेती की भूमि उसके नाम न होकर उसके बूढ़े बाप के नाम है। फिर सरकार कहती है कि इस हालत में किसान के बेटे ने कर्ज से उत्पन्न समस्याओं के कारण आत्महत्या नहीं की। परिवार का बड़ा लड़का बाप के बूढ़े होने के कारण खेती का काम तो संभाल लेता है परंतु उसको यह कभी विचार नहीं आ सकता कि बाप के होते हुए भूमि अपने नाम करवा ले। पिछले दो दशक में किसानों के हालात बुरे हुए हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ हर साल बढ़ती जा रही है। आज इस कृषि प्रधान राज्य में ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं कि किसान अपने आप को हर तरफ से असहाय महसूस कर रहा है। किसानो के आत्मह्त्या की वजह केवल एक ही कारण से हो रही है, ये कहना थोड़ा सा अनुचित होगा, मगर इसकी सबसे शक्तिशाली वजह किसानो का कर्ज में डूबा होना ही रहा है। ये कर्ज कभी सरकार का होता है और कभी साहूकार का, और जब किसान को ऐसा लगने लगता है कि वह अब कर्ज को नहीं चुका पाएगा और उसे समाज में भारी अपमान सहना पड़ेगा तो उसे सबसे आसान रास्ता आत्महत्या ही नजर आता है। उसे उस समय यह बिल्कुल समझ नहीं आता है कि वह क्या करे और घबराहट में वह आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा देता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि फसल तो बहुत अच्छी होती है, लेकिन उस फसल को बेचने के बाद उसे उसका भुगतान इतने दिनों बाद मिलता है को वह कर्ज कई गुणा हो चुका होता है और मासूम किसान उसे चुकाने में खुद को असमर्थ पाता है। आज भारत के प्रमुख उद्योगपति छत्तीसगढ़ राज्य में अपने उद्योग स्थापित कर रहे हैं और वे इसके लिए किसानो की जमीन को सरकार के माध्यम से हथिया रहे हैं जिसे कानून की भाषा में अनिवार्य अधिग्रहण कहा जाता है। ऐसा होने से बहुत सारे किसान भूंमिहीन हो रहे हैं, जिस वजह से भी अन्नदाता हताश होकर आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। अगर हम इन सभी कारणो को ध्यान से देखें तो इसमे कोई भी ऐसी वजह नही है जिसे दूर नही किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए सिर्फ सरकार को ही नहीं बल्कि, हमें और किसान सभी को जागना होगा। वैसे तो इतिहास गवाह है कि हमेशा राजनीतिज्ञों ने किसानो से सिर्फ वायदे ही किए हैं, लेकिन उन वायदों को शायद ही कभी पूरा किया हो और आज उसी का परिणाम है कि किसान सरकार से ही तंग आकर आत्महत्या करने लगा है। अगर सरकार इस मामले में जागरुक हो जाए तो शायद ही कभी ऐसी समस्या आए। दूसरा हमारा समाज, कहने के लिए तो समाज आधुनिकता की तरफ बढ़ रहा है। समाज में साक्षरता भी बढ़ रही है लेकिन आज भी किसी मजबूर को मदद देने की बजाए, उसको जलील करने में हमारे समाज को बहुत मजा आता है। इन बढ़ती हुई आत्महत्यों में भी कहीं न कहीं हमारा सामाजिक परिवेश भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। अगर आज जो स्थिति है उसके सुधार नही हुआ और हम नहीं सुधरे, हमारी राजनीति नहीं सुधरी, तो शायद जो किसान आज पूरे देश के लिये अन्न पैदा कर रहा है वो अनाज सिर्फ अपने लिए ही पैदा करेगा और उसके बाद जो स्थिति होगी उसके बारे में सोचा भी नही जा सकता।

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