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“माँ !  मैं तुम्हारे और दोनों भाइयों के हाथ जोडती हूँ, मुझे कुछ पैसे दे दो या दिलवा दो.. भगवान् के लिए मदद करो.. चार दिनों बाद बेटी की शादी है..”

“देखो दीदी..! .. हमने हर समय तुम्हारा बहुत साथ दिया है.. यहाँ तक कि तुम्हारी दोनों बेटियों की शादी का पूरा खर्च वहन करने की सोचे थे. बेटे को भी काम-धंधे पर लगवा देंगे..  लेकिन तुमने निकम्मे जीजाजी.. और लोगो के कहने पर हम पर ही मुकदमा दायर कर दिया.. ? क्या तो हिस्सा पाने की खातिर ?!! ”

“माँ, तुम तो कुछ बोलो, तुम्ही समझाओ न.. इन दोनों को.. ”

“ बेटी..! मैं क्या समझूँ.. मैं क्या समझाऊँ ? यह सब तो तुम्हें सोचना था. ये जो तेरे भाइयों को पैसा मिला है न.. वो बाँध में जमीनों के डूबने के ऊपर पुनर्स्थापन का पैसा है..   और, मुझे तो इन्हींके साथ रहना है.. “

जितेंद्र  'गीत'
(मौलिक व्   अप्रकाशित )

   

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 12, 2014 at 1:51pm

रचना पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया हेतु आपका ह्रदय से आभार आदरणीया राजेश दीदी

सादर!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 11, 2014 at 7:45pm

जीतेंद्र जी

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी i


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 11, 2014 at 9:56am

क्या पुनर्स्थापन का पैसा सिर्फ बेटों का है? क्या वो जमीन बेटी की भी उतनी ही नहीं थी जितनी की बेटों की ?

क्या माँ का पुत्रों पर आश्रिता बन जाना और अपनी बेटी के लिए चाह कर भी कुछ नहीं कर पाना समाज के एक कडवे सच को नहीं दर्शा रहा ?

बेटी यदि अपने हक़ की माग करती है क़ानून की मदद से तो क्या गलत है?

समाज में आज भी बेटियों को बेटों के जितने अधिकार नहीं दिए जाते.. उसे आत्म निर्भरता की नहीं आश्रिता की ज़िंदगी मिलती है .... कभी पिता पर पति पर बेटों पर या भाइयों पर!!! कितना दयनीय है 

एक सार्थक प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आ० जितेन्द्र जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 10, 2014 at 11:35am

पिस तो बीच में लड़की ही रही ना ? पति की बात नहीं मानेगी तो उधर से धक्के ,मायके वालों की नहीं सुनेगी तो इधर से धक्के ...यही तो विडम्बना है ,थी और रहेगी यदि लड़कियां आत्मनिर्भर और मजबूत ,समझदार नहीं बनेगी ....क्या उस पति की जिम्मेदारी नहीं है अपने बच्चों की शादी या पालन पोषण की ?ऐसे पति को क्या कहें जो पत्नी को बीच में मोहरा बनाए हुए है .बहुत अच्छे सामयिक विषय पर लघु कथा लिखी है जितेन्द्र भैय्या जो हर द्रष्टि कोण से मस्तिष्क मंथन कराने में कामयाब है |बहुत- बहुत बधाई. 

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