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बीच राह श्मशान बना दो

बीच राह श्मशान बना दो
इंसानों को यह समझा दो |

जीवन नश्वर है यह जानें
मृत्यु सत्य है उसको मानें
नफरत छोड़ प्यार सिखला दो

इंसानों को यह .......

रूप बड़ा ही सुन्दर पाया
काया ने कब साथ निभाया
साँच बुढ़ापे का दिखला दो

इंसानों को यह .......

यह जग एक मुसाफिरखाना
इसका राज नहीं जो जाना
राज यही उसको बतला दो

इंसानों को यह .......

रिश्ते सारे अजब अनूठे
पाश मोह ममता के झूठे
प्रीत ईश के संग लगा दो

इंसानों को यह .......

................................

..मौलिक व अप्रकाशित...

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Comment by coontee mukerji on May 27, 2014 at 6:26pm

बीच राह श्मशान बना दो
इंसानों को यह समझा दो |

जीवन नश्वर है यह जानें
मृत्यु सत्य है उसको मानें
नफरत छोड़ प्यार सिखला दो

इंसानों को यह .......हमारे जीवन का सत्य  श्मशान पर आकर ही जीवन की राह दिखाता है.....बहुत ही अनुभव के बाद ही ऐसी रचना लिखी जा सकती है...साधुवाद...सादर.

Comment by Meena Pathak on May 27, 2014 at 4:01pm

बहुत सुन्दर रचना आ० सरिता जी | बहुत बहुत बधाई 

Comment by Sarita Bhatia on May 27, 2014 at 3:45pm

आदरणीय नरेन्द्र जी शुक्रिया 

Comment by Sarita Bhatia on May 27, 2014 at 3:45pm

शुक्रिया जितेन्द्र भाई 

Comment by Sarita Bhatia on May 27, 2014 at 3:45pm

आदरणीय गोपाल नारायन जी हार्दिक आभार ....सादर 

Comment by Sarita Bhatia on May 27, 2014 at 3:44pm

आदरणीय श्याम जी शुक्रिया 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 27, 2014 at 11:55am

बहुत सुंदर प्रभावशाली रचना, बधाई आदरणीया सरिता जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 27, 2014 at 11:49am

सरिता जी i अच्छी रचना के लिए बधाई i

Comment by Shyam Narain Verma on May 26, 2014 at 5:03pm
सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिये आपको बधाइयाँ ।

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