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तीर दिल पे चलाये छुप के, पर ( ग़ज़ल ) गिरिराज़ भंडारी

2122       1212      112/22

बांट के     छाव,     धूप     पीते   हैं      

ज़िन्दगी  हम  शज़र  की जीते हैं

चाल दोनो तरफ की खुद चल के

खुश  बड़े   हैं , कि  दाँव  जीते  हैं

तीर  दिल  पे चलाये छुप के, पर

सामने   सब  के  ज़ख़्म  सीते  हैं

मैने  देखा  है  वक़्ते   आख़िर  में

हाथ   जितने  दिखे, वो   रीते  हैं

बात   उल्टी  लगेगी,  है  सीधी

स्वाद   मीठे,  असर  से  तीते  हैं

लम्हे खुशियों के ज्यों कपूर उड़े

ग़म के , ज्यों माह साल बीते हैं

**************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2014 at 11:30pm

एक अच्छी ग़ज़ल क लिए बधाई.

चाल दोनो तरफ की खुद चल के

खुश  बड़े   हैं , कि  दाँव  जीते  हैं ... . .इस शेर ने मुझे बहुत मुतास्सिर किया है. 

दिल से दाद दे रहा हूँ, आदरणीय.

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 5, 2014 at 2:21pm

आदरणीय बड़े भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 5, 2014 at 2:21pm

आदरणीया प्राची जी , आपकी सराहना ने गज़ल का मान और मेरा हौसला दोनो बढ़ा दिया , आपका बहुत बहुर आभार ॥

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 5, 2014 at 12:30pm

छोटे भाई , सुंदर भाव , अच्छी गजल , बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 4, 2014 at 7:22pm

चाल दोनो तरफ की खुद चल के

खुश  बड़े   हैं , कि  दाँव  जीते  हैं.................क्या बात है!

मैने  देखा  है  वक़्ते   आख़िर  में

हाथ   जितने  दिखे, वो   रीते  हैं.................बहुत सुन्दर 

बात   उल्टी  लगेगी,  है  सीधी

स्वाद   मीठे,  असर  से  तीते  हैं.................बहुत गहरी बात 

इस सुन्दर गज़ल पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएं आ० गिरिराज जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 4, 2014 at 2:28pm

आदरणीय भुवन भाई , ग़ज़ल की सराहना कर  उत्साह वर्धन करने के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 4, 2014 at 2:27pm

आ. मुकेश भाई , ग़ज़ल को पसन्द करने के लिये आपका आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 4, 2014 at 2:26pm

आ. लक्ष्मण भाई , ग़ज़ल की सराहना और उत्साह वर्धन के लिये बहुत शुक्रिया ॥

Comment by भुवन निस्तेज on April 4, 2014 at 8:57am

बांट के छाव, धूप पीते हैं
ज़िन्दगी हम शज़र की जीते हैं


चाल दोनो तरफ की खुद चल के
खुश बड़े हैं , कि दाँव जीते हैं

बेहद खूबसूरत इस उम्दा ग़ज़ल के लिए दाद कबूल करें। ....

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 3, 2014 at 10:33pm

आदरणीय गिरिराज जी
इस खूबसूरत ग़ज़ल पर ढेरो मुबारकबाद

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