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ग़ज़ल : पत्थरों में खौफ़ का मंज़र भरे बैठे हैं हम

एक ताज़ा ग़ज़ल आपकी मुहब्बतों के हवाले ....


पत्थरों में खौफ़ का मंज़र भरे बैठे हैं हम |

आईना हैं, खुद में अब पत्थर भरे बैठे हैं हम |

 

हम अकेले ही सफ़र में चल पड़ें तो फ़िक्र क्या,
अपनी नज़रों में कई लश्कर भेरे बैठे हैं हम |

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |

 

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले,
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम |

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,
इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम |

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 24, 2014 at 11:03pm

वाह, सुन्दर ग़ज़ल भाई जी !!

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 24, 2014 at 10:11pm

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले,
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम |

wah wah sir ji khoob gazal kahi hai ek shanka hai rakaran karen

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,
इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम |

isme kya takabule radeef ka dosh to nahi ho raha hai ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, maaf karna aapse hi seekha hai main shayad poora samajh nahi paya  asha hai samadhan karenge,,,,,,,,,,,,,,,,,,,?

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 24, 2014 at 9:09pm

आदरणीय वीनस भाई , सिर्फ इतना कहना है - आप ग़ज़लों के सिकंदर हो गए . कोटि कोटि हार्दिक बधाई .

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 24, 2014 at 5:36pm

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,

अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |

 

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,

इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम |

इस आला और बेहतरीन ग़ज़ल पर पुरज़ोर दाद और मुबारकबाद हाजिर है..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 24, 2014 at 10:36am

आदरणीय वीनस भाई , क्या तारीफ करूँ आपकी ग़ज़ल की , कहन की , बस ललचा जाता हूँ ॥ शानदार गज़ल कही है भाई , हार्दिक बधाइयाँ ॥

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,
इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम  ---- सबके अन्दर की हक़ीक़त है , लाजवाब ॥ ढेरों दाद ॥

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