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दोहे (शून्य आकांक्षी)

दोहे 
घुला कुदरती रंग  में, मौसम  का  उल्लास । 
धूप  गुलाबी  टहलती,  हरी - हरी  है  घास ॥1॥ 

हवा  बिखेरे  हर  तरफ, देखो  प्रेम - गुलाल । 
प्रकृति गा रही फाग है, करतीं दिशा धमाल ॥2॥ 

होली   समरसता   तथा,  सद्भावों   का  पर्व । 
सामूहिकता  को  निरख, परम्परा  पर  गर्व ॥3॥ 

नहीं  बुरा  पीछे  भ्रमण, गर कोई नहिं रुष्ट । 
जाएँ  उसी  अतीत  में,  वर्तमान   हो  पुष्ट ॥4॥ 

वैर  और  ईर्ष्या  जले,  पले  हृदय  में प्यार । 
समरसता,  सद्भाव  का,  होली  है   त्यौहार ॥5॥ 

प्रीति  हो  रही  बावली, मन  मुरली की टेर । 
दर्शन के  प्यासे  नयन, कान्हा  करो न देर ॥6॥ 

मन  के  भीतर  ले  रहा, इंद्रधनुष  आकार । 
सात रंग का  स्वप्न अब, होने को  साकार ॥7॥ 

रंग  छा  रहे  मिलन  के, छाई मस्त बहार । 
ढाई आखर  चमकता, मिलते  नयना चार ॥8॥ 

- शून्य आकांक्षी 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

होली पर्व पर OBO समूह के सभी सदस्यों और पाठकों को शुभकामनाएँ एवं बधाई । 
- शून्य आकांक्षी 

 

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 16, 2014 at 9:59pm

आ0 उपाध्याय भार्इजी,    बहुत सुन्दर दोहावली। बधार्इ स्वीकारें। किन्तु दोहा नं0-2,6,8 पर पुन: गौर कर लें। सादर,  आपको सपरिवार होलिकोत्सव की शुभकामनाओं सहित हार्दिक बधार्इयां।  सादर


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Comment by rajesh kumari on March 14, 2014 at 8:24pm

बहुत सुन्दर दोहावली आ० cm upaadhyaay जी, बहुत- बहुत बधाई ,आपको ओबीओ पर देखकर  बहुत अच्छा लगा ,आपका हार्दिक स्वागत है . 

Comment by बृजेश नीरज on March 14, 2014 at 8:19pm

बहुत सुन्दर दोहे! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Sarita Bhatia on March 14, 2014 at 3:32pm

बहुत खुबसूरत दोहावली होली की ,हार्दिक बधाई आपको एवं आपके परिवार को 

Comment by Shyam Narain Verma on March 14, 2014 at 2:57pm

बहुत सुन्दर दोहे बधाई .. 

आपको सपरिवार होली की शुभकामना |

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