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ग़ज़ल- सारथी || आशिकों की आँख का मोती ग़ज़ल ||

आशिकों की आँख का मोती ग़ज़ल

देखिए , हंसती कभी रोती ग़ज़ल/१ 

है नफ़ासत औ मुहब्बत से पली

तरबियत के बीज भी बोती ग़ज़ल/२ 

इन लतीफ़ों –आफ़रीं के दरम्यां

आलमी मेयार को खोती ग़ज़ल/३ 

मुफ़लिसी , ये भूख औ तश्नालबी

देख ये मंजर, कहाँ सोती ग़ज़ल/४ 

‘सारथी’ जाया न नींदें कीजिये

रतजगा करके कहाँ होती ग़ज़ल/५

.....................................................

सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित  

अरकान: २१२२ २१२२  २१२    

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Comment by Saarthi Baidyanath on March 29, 2014 at 2:00pm

आदरणीय बहुत दिनों से नदारद था मंच से ...क्षमा प्रार्थी ! आपका स्नेह मिला , बहुत बहुत धन्यवाद ! आशीष देते रहिएगा ! 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 23, 2014 at 3:42pm

ग़ज़लके हो जाने के तथ्य को साझा करती और ग़ज़ल की इकाई का बयान करती आपकी ग़ज़ल अपने उद्येश्य में सफल है, भाईजी.

शुभ-शुभ

Comment by Saarthi Baidyanath on March 10, 2014 at 1:30pm

कोटिशः धन्यवाद आदरणीया  Dr.Prachi Singh जी ! आपका स्नेह पाकर , उर्जा मिल जाती है ..नव-लेखन के लिए !..नमन !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 10, 2014 at 10:56am

बहुत खूबसूरत मतला..

आशिकों की आँख का मोती ग़ज़ल

देखिए , हंसती कभी रोती ग़ज़ल/१...............वाह.

ग़ज़ल पर कही गयी ये ग़ज़ल बहुत सुन्दर हुई है 

हार्दिक बधाई आ० वैद्यनाथ सारथी जी 

Comment by Saarthi Baidyanath on March 6, 2014 at 1:35pm

मान्यवर  जितेन्द्र 'गीत' साहब , बहुत मेहरबानी ! सादर प्रणाम ! स्नेह देने के लिए :)

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 5, 2014 at 11:12pm

बेहद खूबसूरत गजल कही है आपने आदरणीय बैद्यनाथ जी, हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by Saarthi Baidyanath on March 5, 2014 at 10:34pm

सादर आभार ज्ञापित कर रहा हूँ आदरणीय  Kewal Prasad जी ! स्नेह बनाये रखियेगा ! नमन सहित :)

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 5, 2014 at 7:29pm

आ0 वैद्यनाथ भाई जी, '

"है नफ़ासत औ मुहब्बत से पली

तरबियत के बीज भी बोती ग़ज़ल!'......'सुन्दर गजल कही है। बधाई स्वीकारे। सादर,

Comment by Saarthi Baidyanath on March 4, 2014 at 9:18pm

मान्यवर gumnaam pithoragarhi जी , आपका आशीष मिला , खुशनसीबी है हमारी ! बहुत बहुत धन्यवाद आपका ! सादर नमन !

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 4, 2014 at 6:18pm

सारथी’ जाया न नींदें कीजिये

रतजगा करके कहाँ होती ग़ज़ल

 

इन लतीफ़ों –आफ़रीं के दरम्यां

आलमी मेयार को खोती ग़ज़ल

 

khoob bahut khoob bhaiji badhai

 

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